उत्तराखण्ड

उत्तरांचल पीजी कॉलेज विवाद पहुंचा NHRC, UGC समेत कई अधिकारियों को नोटिस

देहरादून के उत्तरांचल पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में छात्रों के साथ कथित धार्मिक भेदभाव के आरोप अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) तक पहुंच गए हैं। आयोग ने शिकायत का प्रारंभिक परीक्षण करने के बाद मामले को प्रथम दृष्टया मानवाधिकारों के संभावित उल्लंघन से जुड़ा मानते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), उत्तराखंड सरकार, कॉलेज प्रशासन और जिला प्रशासन सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कॉलेज परिसर में हिंदू छात्राओं को बिंदी लगाने तथा छात्रों को तिलक और हाथ में पूजा का लाल धागा (कलावा) पहनकर आने से रोका गया। निर्देशों का पालन नहीं करने वाले कुछ छात्रों को अनुपस्थित दर्ज करने, उनके हाथों से कलावा उतरवाने और अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए तस्वीरें लेने के भी आरोप लगाए गए हैं। वहीं शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि मुस्लिम छात्राओं को बुर्का पहनने की अनुमति दी जा रही थी, जिससे धार्मिक आधार पर अलग-अलग व्यवहार किए जाने का आरोप सामने आया है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह संविधान में दिए गए समानता, धार्मिक स्वतंत्रता, गरिमा और अंतरात्मा की स्वतंत्रता जैसे मूल अधिकारों का उल्लंघन होगा। शिकायत में निष्पक्ष जांच, छात्रों की सुरक्षा, दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और धार्मिक प्रतीकों को लेकर समान एवं भेदभावरहित नीति लागू करने की मांग की गई है।मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 12 के तहत संज्ञान लेते हुए NHRC ने UGC के अध्यक्ष, उत्तराखंड के उच्च शिक्षा सचिव, चिकित्सा शिक्षा सचिव, कॉलेज के प्राचार्य, जिलाधिकारी देहरादून और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) देहरादून को नोटिस जारी किए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसने फिलहाल केवल शिकायत के आधार पर संज्ञान लिया है और अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट मिलने के बाद ही निकाला जाएगा।

यह विवाद 29 जून 2026 को उस समय शुरू हुआ था जब कुछ छात्रों ने आरोप लगाया कि उन्हें तिलक और कलावा पहनकर कॉलेज आने से रोका गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला तेजी से बढ़ा और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने कॉलेज पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया। संगठन ने इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय बताते हुए कॉलेज प्रशासन से अपने निर्देश वापस लेने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने देने की मांग की थी।

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