उत्तराखंड की राजनीति में एक ऐसा अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया, जिसने अपनी ईमानदार छवि, सख्त प्रशासनिक फैसलों और अनुशासित कार्यशैली से अलग पहचान बनाई। पूर्व मुख्यमंत्री B. C. Khanduri के निधन के बाद प्रदेशभर में शोक की लहर है। उन्हें सिर्फ एक राजनेता नहीं बल्कि स्वच्छ राजनीति और जनसेवा का प्रतीक माना जाता था। उनके निधन से उत्तराखंड की राजनीति ने एक ऐसा चेहरा खो दिया है, जिसकी सादगी और ईमानदारी की मिसाल आज भी दी जाती है।
साल 2011 में उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला था। उस समय भाजपा हाईकमान ने तत्कालीन मुख्यमंत्री Ramesh Pokhriyal Nishank को पद से हटाकर एक बार फिर बीसी खंडूरी के हाथों में सत्ता की कमान सौंपी थी। सितंबर 2011 में हुए इस फैसले ने प्रदेश की राजनीति को नया मोड़ दे दिया था। पार्टी संगठन और सरकार के बीच बढ़ती दूरी, प्रशासनिक ढिलाई और आगामी विधानसभा चुनावों की चुनौती को देखते हुए भाजपा नेतृत्व ने यह बड़ा कदम उठाया था।
उस समय भाजपा के भीतर लगातार यह चर्चा चल रही थी कि सरकार की कार्यशैली को लेकर जनता और संगठन दोनों स्तरों पर नाराजगी बढ़ रही है। कई मुद्दों पर सरकार घिरती नजर आ रही थी, जिससे पार्टी की छवि पर असर पड़ रहा था। ऐसे माहौल में भाजपा को एक ऐसे चेहरे की जरूरत महसूस हुई जो जनता के बीच भरोसेमंद और साफ-सुथरी छवि रखता हो। यही वजह रही कि पार्टी हाईकमान ने दोबारा बीसी खंडूरी पर भरोसा जताया।
भुवन चंद्र खंडूरी अपनी सख्त प्रशासनिक शैली और ईमानदार छवि के लिए पूरे देश में पहचाने जाते थे। सेना की पृष्ठभूमि से आने वाले खंडूरी ने राजनीति में भी अनुशासन और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार पर सख्ती दिखाई और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश की। उनकी कार्यशैली को लेकर समर्थकों के बीच खासा उत्साह देखने को मिलता था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार उस दौर में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता का भरोसा बनाए रखना था। भ्रष्टाचार और प्रशासनिक फैसलों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच पार्टी को एक मजबूत और विश्वसनीय नेतृत्व की जरूरत थी। ऐसे में बीसी खंडूरी की वापसी को भाजपा के “डैमेज कंट्रोल” और संगठन को दोबारा मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा गया था।
हालांकि, नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद भाजपा 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्ता बरकरार नहीं रख सकी। लेकिन इसके बावजूद बीसी खंडूरी की व्यक्तिगत छवि और राजनीतिक साख पर कोई असर नहीं पड़ा। आज भी उन्हें उत्तराखंड की राजनीति में ईमानदारी, सादगी और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है।