सितारगंज में SIR के आंकड़ों से बदला चुनावी गणित? 15,756 नामों की कटौती और नारायण पाल की वापसी ने बढ़ाई सियासी हलचल

सितारगंज: उत्तराखंड की तराई-भाबर बेल्ट की महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों में शामिल सितारगंज में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। एक तरफ विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) के दौरान मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव चर्चा में है, तो दूसरी ओर पूर्व विधायक नारायण पाल के कांग्रेस में लौटने से पुराने राजनीतिक समीकरणों की फिर से चर्चा शुरू हो गई है। सितारगंज में 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सौरभ बहुगुणा ने कांग्रेस के नवतेज पाल सिंह को 10,938 मतों से हराया था। बहुगुणा को 43,354 और नवतेज पाल सिंह को 32,416 वोट मिले थे। वहीं आम आदमी पार्टी के अजय जायसवाल को 10,135 और बसपा के नारायण पाल को 9,258 वोट मिले थे। अब 2027 से पहले मतदाता सूची में हो रहे बदलाव और प्रमुख नेताओं की राजनीतिक स्थिति में आए परिवर्तन को लेकर सीट के चुनावी समीकरणों पर नजरें टिक गई हैं।
SIR में 15,756 नामों की कटौती का दावा, अंतिम सूची से तस्वीर होगी साफ
सितारगंज विधानसभा क्षेत्र में SIR प्रक्रिया के दौरान 15,756 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने का आंकड़ा सामने आने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध आधिकारिक ऑनलाइन स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए इसे फिलहाल अंतिम मतदाता सूची का आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा। राज्य स्तर पर SIR के दौरान मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर जांच और सत्यापन की प्रक्रिया चल रही है। उत्तराखंड में करीब 95 हजार Form-7 आवेदन ऑटो-जेनरेट हुए, जिन्हें उन मतदाताओं से जोड़ा गया जिन्हें प्रक्रिया के दौरान अयोग्य या तार्किक विसंगतियों वाला पाया गया था। राज्य की अंतिम मतदाता सूची 3 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित होने की जानकारी दी गई है। यही वजह है कि सितारगंज में सामने आए आंकड़े को भी अंतिम तस्वीर के तौर पर देखने से पहले दावे-आपत्तियों और अंतिम पुनरीक्षित सूची का इंतजार महत्वपूर्ण होगा।
2022 का नतीजा और मौजूदा मतदाता गणित
2022 के चुनाव में सौरभ बहुगुणा को 43,354 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के नवतेज पाल सिंह को 32,416 वोट मिले। दोनों के बीच अंतर 10,938 वोट का था। दिलचस्प बात यह है कि उस चुनाव में तीसरे और चौथे स्थान पर रहे अजय जायसवाल और नारायण पाल को क्रमशः 10,135 और 9,258 वोट मिले थे। दोनों के वोट जोड़ने पर यह संख्या 19,393 तक पहुंचती है। हालांकि, अलग-अलग चुनावों में वोटरों का व्यवहार, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और मतदान प्रतिशत बदलता है, इसलिए केवल पिछले चुनाव के आंकड़ों को जोड़कर आगामी चुनाव का परिणाम तय नहीं किया जा सकता। इसी वजह से SIR के बाद मतदाता सूची में होने वाले बदलाव को लेकर राजनीतिक दलों की बूथ स्तर की रणनीति महत्वपूर्ण हो सकती है।
शक्तिफार्म और बंगाली मतदाताओं की भूमिका पर नजर
सितारगंज की राजनीति में शक्तिफार्म क्षेत्र और बंगाली मूल के मतदाताओं की भूमिका लंबे समय से चर्चा में रही है। शक्तिफार्म, बैकुंठपुर और आसपास की पुनर्वास बस्तियां इस विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक-राजनीतिक समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। भूमि अधिकार, नजूल और कृषि भूमि से जुड़े मुद्दे, जाति प्रमाणपत्रों से जुड़े विवाद, बाढ़ और ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं जैसे विषय इस क्षेत्र की स्थानीय राजनीति में उठते रहे हैं। ऐसे में यदि SIR के दौरान किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में मतदाता सूची में अपेक्षाकृत अधिक बदलाव हुआ है, तो राजनीतिक दल उस पर बूथवार समीक्षा कर सकते हैं। लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि मतदाता सूची में हुए बदलाव का किसी एक दल को निश्चित रूप से राजनीतिक लाभ या नुकसान होगा। इसका वास्तविक प्रभाव अंतिम सूची और बाद के चुनावी मतदान में ही स्पष्ट हो सकेगा। सितारगंज में भाजपा की स्थिति को समझने के लिए 2017 और 2022 के नतीजे भी महत्वपूर्ण हैं। 2017 में सौरभ बहुगुणा ने 50,597 वोट हासिल कर 28,450 वोट के बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी, जबकि 2022 में उनका जीत का अंतर घटकर 10,938 रह गया।
नारायण पाल की कांग्रेस में वापसी से बदला विपक्ष का समीकरण
सितारगंज की राजनीति में दूसरा बड़ा घटनाक्रम पूर्व विधायक नारायण पाल की कांग्रेस में वापसी है। मार्च 2026 में नारायण पाल कांग्रेस में शामिल हुए थे। वह इससे पहले 2002 और 2007 में सितारगंज से बसपा के टिकट पर विधायक रह चुके हैं। 2022 में उन्होंने बसपा प्रत्याशी के तौर पर 9,258 वोट हासिल किए थे। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी नवतेज पाल सिंह को 32,416 वोट मिले थे।नारायण पाल के कांग्रेस में आने के बाद पार्टी के सामने एक तरफ संगठनात्मक ताकत को एकजुट रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ संभावित टिकट दावेदारों के बीच संतुलन बनाना भी महत्वपूर्ण होगा। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि 2027 में कांग्रेस किस चेहरे को उम्मीदवार बनाएगी। अप्रैल 2026 में नारायण पाल की कांग्रेस में वापसी के बाद स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में बदलाव की चर्चा भी सामने आई थी।
कांग्रेस के सामने नवतेज पाल सिंह और नारायण पाल के बीच संतुलन की चुनौती
2022 में कांग्रेस के उम्मीदवार रहे नवतेज पाल सिंह ने 32,416 वोट हासिल किए थे। इसके अलावा वह आगामी चुनावी तैयारियों के लिहाज से क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। दूसरी ओर नारायण पाल के पास दो बार विधायक रहने का अनुभव और अपना पुराना राजनीतिक नेटवर्क है। ऐसे में दोनों नेताओं की मौजूदगी कांग्रेस के लिए संगठनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन टिकट चयन के समय पार्टी के सामने अंदरूनी तालमेल बनाए रखने की चुनौती भी हो सकती है। यह भी ध्यान रखना होगा कि 2022 में नारायण पाल को मिले 9,258 वोटों को सीधे कांग्रेस के वोट में जोड़ना चुनावी तौर पर सही अनुमान नहीं होगा। अलग पार्टी, अलग उम्मीदवार और अलग राजनीतिक परिस्थितियों में मिले वोट अपने आप दूसरे चुनाव में स्थानांतरित नहीं होते।
भाजपा के सामने सौरभ बहुगुणा की स्थिति
भाजपा की ओर से वर्तमान विधायक और कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा सितारगंज की राजनीति में प्रमुख चेहरा हैं। उन्होंने 2017 और 2022 दोनों विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की है। 2022 में उनकी जीत का अंतर 10,938 वोट रहा था। उनके सामने आगामी चुनाव में स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े सवाल भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, 2027 के लिए भाजपा की ओर से उम्मीदवार चयन को लेकर अंतिम फैसला अभी सामने नहीं आया है। सितारगंज की राजनीति में भूमि संबंधी मुद्दे भी लगातार महत्वपूर्ण रहे हैं। जुलाई 2026 में नारायण पाल ने भी भूमि नियमितीकरण से जुड़ा बयान दिया था, जिससे साफ है कि जमीन और अधिकार से जुड़े मुद्दे चुनावी बहस में बने हुए हैं।
AAP और BSP भी बदल सकते हैं मुकाबले की तस्वीर
2022 में आम आदमी पार्टी के अजय जायसवाल को 10,135 वोट मिले थे। यह आंकड़ा बताता है कि उस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के अलावा तीसरे विकल्प के रूप में AAP ने भी उल्लेखनीय वोट हासिल किए थे। वहीं नारायण पाल के कांग्रेस में जाने के बाद बसपा के सामने सितारगंज में नया स्थानीय चेहरा और संगठन खड़ा करने की चुनौती हो सकती है। यदि AAP और BSP दोनों मैदान में मजबूत उम्मीदवार उतारते हैं, तो बहुकोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है। हालांकि, 2027 के उम्मीदवारों की अंतिम सूची अभी सामने नहीं आई है, इसलिए किसी दल के वोट शेयर या चुनावी प्रदर्शन को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना फिलहाल जल्दबाजी होगी।
SIR के बाद क्या बदलेगा? अंतिम मतदाता सूची होगी सबसे अहम
सितारगंज के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन होगा। उत्तराखंड में SIR के दौरान बड़ी संख्या में मतदाता रिकॉर्ड की जांच हुई है और Form-7 से जुड़े मामलों की भी समीक्षा की जा रही है।इसके बाद राजनीतिक दलों के पास बूथवार यह देखने का अवसर होगा कि किन इलाकों में कितने नाम हटे, कितने नाम जुड़े और कितने दावे-आपत्तियों के बाद रिकॉर्ड में वापस आए। यही वजह है कि सितारगंज में अभी सामने आए 15,756 के आंकड़े को अंतिम राजनीतिक गणित मानने के बजाय इसे SIR प्रक्रिया के बीच का एक आंकड़ा समझना ज्यादा उचित होगा।
2027 से पहले सितारगंज में कई स्तरों पर मुकाबला
सितारगंज में 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस की पारंपरिक लड़ाई तक सीमित रहेगा या इसमें AAP, BSP अथवा अन्य चेहरे भी प्रभावी भूमिका निभाएंगे, यह आने वाले महीनों में ज्यादा स्पष्ट होगा। एक तरफ सौरभ बहुगुणा के सामने 2017 और 2022 की जीत के बाद अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी। दूसरी ओर कांग्रेस में नारायण पाल की वापसी ने पार्टी के भीतर पुराने और नए समीकरणों को एक साथ ला दिया है। इन सबके बीच SIR के बाद मतदाता सूची में हुए बदलाव, अंतिम रूप से कितने नाम बहाल होते हैं और किन इलाकों में मतदाता संख्या में सबसे ज्यादा परिवर्तन आता है, यह सितारगंज की 2027 की चुनावी चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि 2027 से काफी पहले ही सितारगंज में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं, लेकिन अंतिम चुनावी तस्वीर उम्मीदवारों, गठबंधनों, स्थानीय मुद्दों और अंतिम मतदाता सूची सामने आने के बाद ही ज्यादा स्पष्ट होगी।




