देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक बहस के बीच कर्नाटक में फॉर्म-7 के बड़े पैमाने पर दाखिल किए जाने का मामला चर्चा में है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबू कुमार के हालिया बयान के बाद इस प्रक्रिया को लेकर नए सवाल उठे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि केवल फॉर्म-7 दाखिल होने से किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाता। नाम हटाने से पहले निर्धारित जांच और प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है।
कर्नाटक में 91 हजार से ज्यादा फॉर्म-7
आंकड़ों के मुताबिक, 16 जून से 4 अक्टूबर 2026 के बीच कर्नाटक में कुल 91,278 फॉर्म-7 आवेदन प्राप्त हुए। CEO वी. अनबू कुमार ने स्पष्ट किया है कि अब तक फॉर्म-7 में दर्ज आपत्तियों के आधार पर किसी भी मतदाता का नाम हटाया नहीं गया है। संबंधित ERO को जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई करनी है। फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज किसी नाम पर आपत्ति दर्ज कराने या किसी नाम को हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। चुनाव प्रशासन के अनुसार, किसी आवेदन के आधार पर सीधे नाम हटाने की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
थोक आवेदन की जांच को लेकर क्या कहा CEO ने?
कर्नाटक CEO के मुताबिक, बड़ी संख्या में फॉर्म-7 दाखिल किए जाने की शिकायतों को लेकर सभी संबंधित अधिकारियों को कानून के मुताबिक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। ERO स्तर पर जांच के बाद यदि किसी आवेदन में जानबूझकर गलत जानकारी या घोषणा किए जाने की पुष्टि होती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।CEO के अनुसार, जांच शुरू होने के बाद संबंधित प्रक्रिया में जवाब देने के लिए निर्धारित समय भी होता है। ऐसे में थोक में आए आवेदनों की जांच और उनकी वैधता का परीक्षण चुनाव प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण चरण बन गया है।
फर्जी फॉर्म-7 को लेकर FIR भी दर्ज
कर्नाटक में इस विवाद के बीच कुछ मामलों में पुलिस कार्रवाई भी हुई है। बल्लारी में भाजपा के बूथ लेवल एजेंट टी. श्रीनिवास मोथकुर के खिलाफ हजारों मतदाताओं के नाम हटाने के लिए कथित तौर पर फॉर्म-7 इस्तेमाल करने के मामले में FIR दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। पुलिस ने उनके कार्यालय की तलाशी के लिए अदालत से सर्च वारंट भी हासिल किया है। वहीं बेंगलुरु के जयनगर विधानसभा क्षेत्र में भी हजारों मतदाताओं के नाम हटाने के लिए कथित तौर पर फर्जी फॉर्म-7 जमा किए जाने के आरोप में FIR दर्ज की गई है। इन मामलों में आरोपों की जांच जारी है और संबंधित पक्षों के दावों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आए हैं।
अब उत्तराखंड के SIR पर भी निगाह
कर्नाटक के घटनाक्रम के बीच उत्तराखंड में SIR के दौरान फॉर्म-7 के इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल भी चर्चा में आ गए हैं। विपक्षी दलों की ओर से आरोप लगाए गए हैं कि बड़ी संख्या में फॉर्म-7 दाखिल कर वैध मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई। दूसरी ओर, चुनाव प्रक्रिया में फॉर्म-7 पर आपत्ति दर्ज होना अपने आप में किसी मतदाता का नाम हटने का प्रमाण नहीं है। ऐसे में उत्तराखंड में भी बड़ा सवाल यही है कि SIR के दौरान दाखिल किए गए फॉर्म-7 की जांच किस स्तर पर हुई, कितने आवेदन स्वीकार या खारिज हुए और किन मामलों में भौतिक सत्यापन अथवा सुनवाई की प्रक्रिया अपनाई गई।
प्रक्रिया और पारदर्शिता पर बढ़ी नजर
कर्नाटक में सामने आए मामलों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान थोक आवेदन, उनकी जांच और गलत जानकारी देने वालों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर बहस तेज कर दी है। चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि मतदाता का नाम हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। अब उत्तराखंड में SIR से जुड़े फॉर्म-7 के आंकड़ों और उनकी जांच प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम मतदाताओं की नजर भी चुनाव प्रशासन की अगली कार्रवाई पर रहेगी।