ऋषिकेश में 2027 की जंग होगी दिलचस्प, 58 हजार से ज्यादा वोट कटने के बाद बदलेगा चुनावी गणित? – Parvat Sankalp News

ऋषिकेश में 2027 की जंग होगी दिलचस्प, 58 हजार से ज्यादा वोट कटने के बाद बदलेगा चुनावी गणित?

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भले ही अभी समय बाकी हो, लेकिन ऋषिकेश विधानसभा सीट पर सियासी हलचल तेज होने लगी है। गढ़वाल के प्रवेश द्वार और योगनगरी के रूप में पहचान रखने वाली ऋषिकेश सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। हालांकि, इस बार मतदाता सूची में हुए बड़े बदलाव, संभावित एंटी-इंकमबेंसी और दोनों प्रमुख दलों के भीतर चल रही राजनीतिक गतिविधियों ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। ऋषिकेश की राजनीति पर नजर रखने वालों के लिए इस बार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा लगातार चले आ रहे अपने दबदबे को बरकरार रख पाएगी या कांग्रेस और अन्य राजनीतिक ताकतें इस बार नए समीकरण बनाने में सफल होंगी?

2022 के जीत के अंतर से तीन गुना ज्यादा वोट कटने का दावा

ऋषिकेश सीट के चुनावी समीकरण में मतदाता सूची में हुए बदलाव को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी प्रेमचंद अग्रवाल की जीत का अंतर 19,057 वोट रहा था। वहीं, इस विश्लेषण में दावा किया गया है कि प्री-SIR के दौरान ऋषिकेश क्षेत्र में 27,120 और SIR प्रक्रिया में 31,089 वोट हटाए गए। यानी दोनों प्रक्रियाओं को मिलाकर करीब 58,209 नाम हटने की बात सामने आ रही है। यदि इन आंकड़ों को आधार माना जाए तो हटाए गए वोटों की संख्या 2022 के जीत के अंतर से तीन गुने से भी ज्यादा बैठती है। हालांकि, केवल मतदाता सूची में हुए बदलाव के आधार पर चुनावी नतीजे का अनुमान लगाना संभव नहीं है। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि हटाए गए नाम किन क्षेत्रों और किस सामाजिक-राजनीतिक समूह से जुड़े थे तथा अंतिम मतदाता सूची में क्या स्थिति रहती है।

दो दशक से भाजपा का मजबूत किला

ऋषिकेश विधानसभा सीट पर पिछले करीब दो दशकों से भाजपा का प्रभाव रहा है। उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव यानी 2002 में कांग्रेस के शूरवीर सिंह सजवाण ने यहां जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2007 में भाजपा के प्रेमचंद अग्रवाल ने जीत हासिल की और फिर लगातार चार विधानसभा चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी। 2007, 2012, 2017 और 2022 में जीत दर्ज कर उन्होंने ऋषिकेश को भाजपा के मजबूत गढ़ में बदल दिया। 2012 में प्रेमचंद अग्रवाल और कांग्रेस के राजपाल सिंह खरोला के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला था। इसके बाद 2017 में भी कांग्रेस और अन्य प्रत्याशियों की चुनौती के बावजूद भाजपा अपना कब्जा बनाए रखने में सफल रही। 2022 में प्रेमचंद अग्रवाल ने कांग्रेस के जयेंद्र चंद रमोला को 19,057 मतों के अंतर से हराया था। यही वजह है कि 2027 में भी भाजपा के सामने इस सीट को बचाए रखना सबसे बड़ी राजनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल हो सकता है।

शहरी वोट बैंक भाजपा की बड़ी ताकत

ऋषिकेश विधानसभा क्षेत्र का सामाजिक और भौगोलिक स्वरूप चुनावी दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। शहरी क्षेत्र, व्यापारिक इलाकों और गंगा तट से जुड़े क्षेत्रों में भाजपा का पारंपरिक संगठनात्मक आधार मजबूत माना जाता है। व्यापारी वर्ग समेत विभिन्न सामाजिक समूहों का समर्थन लंबे समय से भाजपा के लिए फायदेमंद रहा है। दूसरी ओर रायवाला, छिद्दरवाला, वीरभद्र और आसपास के ग्रामीण इलाकों में स्थानीय समस्याएं चुनावी मुद्दों को प्रभावित करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बाढ़ और जलभराव, कृषि भूमि, सड़क, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल चुनावी चर्चा में बने रहते हैं। यही वह क्षेत्र है जहां कांग्रेस और अन्य दल भाजपा के मजबूत शहरी वोट बैंक की काट तलाशने की कोशिश कर सकते हैं।

भाजपा में टिकट को लेकर बढ़ सकती है हलचल

2027 के चुनाव में भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल मौजूदा चेहरे को दोहराने का होगा या किसी नए चेहरे पर दांव लगाने का। प्रेमचंद अग्रवाल का चार बार का चुनावी अनुभव और संगठन में मजबूत पकड़ उन्हें स्वाभाविक दावेदार बनाती है। हालांकि, लंबे समय से एक ही चेहरे के चुनाव लड़ने के कारण एंटी-इंकमबेंसी का सवाल भी राजनीतिक चर्चा में रह सकता है। ऐसे में यदि भाजपा नए चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरने का फैसला करती है तो कई नामों पर चर्चा हो सकती है। राजनीतिक चर्चाओं में सुबोध उनियाल, कुसुम कंडवाल, अनीता ममगाईं, रविंद्र सिंह राणा, प्रतीक कालिया, गिरीश डोभाल और संदीप गुप्ता जैसे नामों का उल्लेख किया जा रहा है। हालांकि अंतिम रूप से टिकट किसे मिलेगा, यह पार्टी नेतृत्व के फैसले पर निर्भर करेगा।

कांग्रेस के सामने गुटबाजी से बाहर निकलने की चुनौती

भाजपा के मुकाबले कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकजुटता की होगी। 2022 में कांग्रेस प्रत्याशी रहे जयेंद्र चंद रमोला लगातार क्षेत्र में सक्रिय दिखाई देते हैं और युवा मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर पूर्व प्रत्याशी राजपाल सिंह खरोला का भी क्षेत्र में पुराना संगठनात्मक आधार बताया जाता है। इसके अलावा कई अन्य स्थानीय नेता भी पार्टी टिकट की दौड़ में अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। कांग्रेस यदि समय रहते टिकट को लेकर आंतरिक मतभेदों को नियंत्रित कर एक मजबूत और सर्वसम्मत प्रत्याशी के पीछे संगठन को खड़ा करने में सफल रहती है, तो 2027 में भाजपा के सामने चुनौती बढ़ सकती है।

क्षेत्रीय दल और निर्दलीय भी बिगाड़ सकते हैं समीकरण

ऋषिकेश में चुनावी मुकाबला सिर्फ भाजपा और कांग्रेस के बीच ही सीमित रहने की संभावना नहीं है। 2022 के चुनाव में क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों और निर्दलीय प्रत्याशियों को भी उल्लेखनीय समर्थन मिला था। ऐसे में 2027 में उत्तराखंड क्रांति दल या किसी मजबूत स्थानीय निर्दलीय उम्मीदवार की मौजूदगी भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोट समीकरण को प्रभावित कर सकती है। खासकर यदि कोई प्रत्याशी किसी खास इलाके या सामाजिक समूह में मजबूत पकड़ बना लेता है, तो वह जीत-हार के अंतर को काफी प्रभावित कर सकता है।

2027 में किन मुद्दों पर होगा मुकाबला?

ऋषिकेश में इस बार चुनावी मुद्दे केवल पार्टी और प्रत्याशी तक सीमित नहीं रहने वाले हैं। शहर और ग्रामीण क्षेत्रों की अलग-अलग प्राथमिकताएं चुनावी नैरेटिव को प्रभावित कर सकती हैं। शहरी इलाकों में ट्रैफिक, पार्किंग, पर्यटन का दबाव, बुनियादी सुविधाएं और स्थानीय विकास प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, जलभराव, बाढ़ सुरक्षा, कृषि भूमि और सरकारी सुविधाओं से जुड़े सवाल ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं। इसके अलावा लंबे समय से सत्ता में रहने वाली पार्टी के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी या संतुष्टि भी चुनावी परिणाम को प्रभावित करने वाला अहम फैक्टर होगी।

भाजपा के लिए गढ़ बचाने की चुनौती, कांग्रेस के पास मौका

ऋषिकेश की 2027 की लड़ाई कई मायनों में भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई होगी। लगातार जीत के बाद पार्टी इस सीट को अपने कब्जे में बनाए रखना चाहेगी। वहीं कांग्रेस के लिए यह लंबे समय से चले आ रहे भाजपा वर्चस्व को तोड़ने का बड़ा अवसर होगा। मतदाता सूची में हुए बदलाव को लेकर सामने आए आंकड़े भी चुनावी चर्चा का हिस्सा हैं, लेकिन इनका वास्तविक चुनावी प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है। अंततः प्रत्याशी चयन, संगठन की सक्रियता, स्थानीय मुद्दे, मतदाताओं की प्राथमिकताएं और मतदान के दिन की वास्तविक भागीदारी ही नतीजे तय करेगी। अगर कांग्रेस एकजुट होकर मजबूत चेहरा मैदान में उतारती है और भाजपा के भीतर टिकट को लेकर असंतोष पैदा होता है, तो ऋषिकेश में मुकाबला पहले के मुकाबले ज्यादा रोचक हो सकता है। लेकिन भाजपा का मजबूत संगठन और लंबे समय से बना वोट बैंक उसे अब भी बढ़त देने वाले प्रमुख कारक हैं। इसलिए 2027 में ऋषिकेश की सीट पर सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा—क्या भाजपा अपना पुराना किला बचा पाएगी या इस बार बदले हुए सियासी समीकरण कोई नया इतिहास लिखेंगे?

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