अंबाला फ्री होल्ड नीति पर फिर घमासान, 11 अगस्त की बैठक पर टिकी नजरें

हरियाणा में 13 अगस्त को प्रस्तावित कैबिनेट बैठक से पहले अंबाला छावनी की फ्री होल्ड संपत्तियों से जुड़ी नीति को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने प्रस्तावित नीति की कई शर्तों पर आपत्ति जताई है। 11 अगस्त को चंडीगढ़ सचिवालय में अधिकारियों के साथ होने वाली बैठक को इसी मुद्दे पर अहम माना जा रहा है। अनिल विज का कहना है कि फ्री होल्ड नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे दशकों से अपनी संपत्तियों पर अधिकार की प्रतीक्षा कर रहे अंबाला छावनी के लोगों को वास्तविक राहत मिले। उनका तर्क है कि यदि नीति की शर्तें इतनी कठिन होंगी कि आम परिवार उन्हें पूरा ही न कर सकें, तो फ्री होल्ड का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। अंबाला छावनी की मौजूदा भूमि व्यवस्था की पृष्ठभूमि वर्ष 1977 के समझौते से जुड़ी है। विज के अनुसार उस समय करीब 1063 एकड़ जमीन को कैंटोनमेंट क्षेत्र से अलग कर नगर पालिका क्षेत्र में शामिल किया गया था। इसके बाद जमीन के स्वामित्व और रजिस्ट्री से जुड़ी व्यवस्था में बदलाव आया, जिससे लंबे समय से संपत्ति मालिकों के सामने कई तरह की परेशानियां बनी हुई हैं।
जमीन का मालिकाना हक स्पष्ट नहीं होने के कारण लोगों को बैंक लोन, संपत्ति हस्तांतरण, विरासत, नक्शा पास कराने और खरीद-फरोख्त जैसी प्रक्रियाओं में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में फ्री होल्ड नीति से लोगों को अपनी संपत्तियों का स्पष्ट अधिकार मिलने की उम्मीद थी। हालांकि, प्रस्तावित नीति की कुछ शर्तों ने इस उम्मीद के साथ चिंता भी बढ़ा दी है। अनिल विज ने सबसे बड़ी आपत्ति जमीन की कीमत कलेक्टर रेट के आधार पर तय किए जाने को लेकर जताई है। उनके अनुसार बड़ी संपत्तियों के मामले में यह रकम करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है, जिसे आम और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए जमा करना बेहद मुश्किल होगा। प्रस्तावित व्यवस्था में आवेदन के समय 25 प्रतिशत राशि जमा करने और बाकी 75 प्रतिशत राशि एक वर्ष के भीतर देने की शर्त भी चर्चा का विषय है। विज का कहना है कि इतने कम समय में बड़ी रकम जुटाना कई परिवारों के लिए संभव नहीं होगा। भुगतान में देरी होने पर संपत्ति सील करने या सरकार के कब्जे में लेने जैसी शर्तों को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई है।
फ्री होल्ड के लिए पुराने मूल दस्तावेजों की अनिवार्यता पर भी विज ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अंबाला छावनी की कई संपत्तियां दशकों पुरानी हैं और अनेक परिवारों के पास इतने पुराने मूल दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो सकते। ऐसे मामलों में बिजली बिल, संपत्ति कर रसीद और अन्य वैध सरकारी रिकॉर्ड को वैकल्पिक प्रमाण के रूप में स्वीकार करने की मांग उठ रही है। विज ने बताया कि जब फ्री होल्ड नीति का प्रस्ताव कैबिनेट में आया तो उन्होंने इसके प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। उनकी आपत्तियों के बाद एजेंडा डिफर किया गया। अब 11 अगस्त को अधिकारियों के साथ होने वाली बैठक में नीति की शर्तों पर विस्तार से चर्चा होने की संभावना है। अंबाला के विभिन्न संगठनों और जनप्रतिनिधियों की ओर से भी नीति में राहत की मांग की जा रही है। इनमें कलेक्टर रेट के बजाय रियायती दर पर भुगतान, शुरुआती 25 प्रतिशत राशि को घटाकर 10 प्रतिशत करना और बाकी रकम जमा करने के लिए पांच साल तक का समय देने जैसी मांगें शामिल हैं।
इसके साथ ही पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने तथा पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर वैकल्पिक सरकारी रिकॉर्ड स्वीकार करने की मांग भी सामने आई है। अब सभी की नजर 11 अगस्त की अधिकारियों के साथ होने वाली बैठक और इसके बाद 13 अगस्त की कैबिनेट बैठक पर है। अनिल विज ने संकेत दिया है कि उनकी प्राथमिकता सरकार के स्तर पर बातचीत के जरिए नीति में जरूरी बदलाव करवाना है। उनका कहना है कि अंबाला छावनी के लोगों के हितों से समझौता नहीं होना चाहिए। अब देखना होगा कि सरकार प्रस्तावित नीति में कितनी राहत देती है और अंतिम फैसला अंबाला के हजारों संपत्ति मालिकों की चिंताओं को किस हद तक दूर कर पाता है।




