उत्तराखण्ड

उत्तराखंड में वृद्धाश्रम योजना: क्या पहाड़ी समाज को वाकई इसकी जरूरत है?

उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में हर जिले में वृद्धाश्रम खोलने की योजना की घोषणा की है। इस कदम ने सामाजिक विमर्श को जन्म दिया है और सवाल उठाया जा रहा है कि क्या वास्तव में पहाड़ी समाज के बुजुर्गों को वृद्धाश्रम की आवश्यकता है। उत्तराखंड की सामाजिक संरचना और पारिवारिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए, कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पारंपरिक और भावनात्मक मूल्यों के विपरीत प्रतीत हो सकता है।

परिवार और बुजुर्ग: पहाड़ी समाज की अनूठी संरचना

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी समाज में परिवार केवल माता-पिता और बच्चों तक सीमित नहीं है। यहाँ परिवार का अर्थ विस्तृत रिश्तों, पड़ोसियों और समाज के अन्य सदस्य तक फैला होता है। बुजुर्ग सदस्यों की देखभाल केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक जिम्मेदारी का हिस्सा मानी जाती है। उदाहरण के लिए, जब किसी बेटी की शादी होती है, तो केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और गांव के लोग भावुक होकर उसका विदाई समारोह देखते हैं। यह भावनात्मक जुड़ाव इस समाज की मजबूती का परिचायक है।

वृद्धाश्रम बनाम आश्रय गृह

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार वास्तव में बुजुर्गों के हित में काम करना चाहती है, तो वृद्धाश्रमों की बजाय निराश्रितों और असहाय लोगों के लिए आश्रय गृह स्थापित करना अधिक उपयुक्त होगा। अधिकांश बुजुर्ग मानसिक और आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं और वे निजी संस्थानों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं।

सामाजिक जिम्मेदारी और भावनात्मक संबंध

भारत में पारिवारिक संरचना गहराई से जुड़ी हुई है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और शिक्षा या रोजगार के कारण पलायन ने एकल परिवारों की संख्या बढ़ा दी है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव अभी भी मजबूत है। बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल संतानें करती हैं, और यदि कहीं उपेक्षा होती है तो प्रशासन सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है।

पश्चिम और भारत में परिवार की तुलना

पश्चिमी समाज में परिवार अधिकतर एकल होते हैं, और वृद्धाश्रम जाना सामान्य है। वहीं भारत में परिवार में खून के रिश्तों के अलावा पड़ोसी, रिश्तेदार और दोस्त भी परिवार का हिस्सा माने जाते हैं। विवाह और अन्य सामाजिक रस्में इस भावनात्मक नेटवर्क को और मजबूत करती हैं। उत्तराखंड में वृद्धाश्रम खोलने का विचार केवल सुविधाजनक समाधान है, लेकिन यह पारंपरिक सामाजिक मूल्यों और भावनात्मक जिम्मेदारियों के विपरीत प्रतीत होता है। एक ऐसा समाज जो अपने बुजुर्गों की देखभाल करने में विफल रहता है, वह धीरे-धीरे नैतिक और सामाजिक पतन की ओर बढ़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को संस्थागत सुविधाओं के बजाय पारिवारिक और सामाजिक समर्थन को सशक्त बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति में बुजुर्गों के प्रति सम्मान और परिवार की भूमिका समाज की मजबूती की आधारशिला है। इसलिए वृद्धाश्रमों की बजाय परिवार और समुदाय आधारित समाधान अधिक कारगर और प्राकृतिक विकल्प साबित हो सकते हैं।

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