Uttrakhand

एमबीपीजी कॉलेज में ‘एग्जाम कन्फ्यूजन’: प्रवेश पत्र हाथ में, फिर भी गलत पेपर देने पहुँच रहे सैकड़ों छात्र।

हल्द्वानी (नैनीताल): नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) का सपना भारत को ‘ग्लोबल नॉलेज सुपरपावर’ बनाना है, लेकिन कुमाऊं विश्वविद्यालय के कॉलेजों से आ रही खबरें इस सपने की जड़ों पर प्रहार कर रही हैं। प्रदेश के सबसे बड़े एमबीपीजी कॉलेज (MBPG College) सहित कई संस्थानों में स्नातक प्रथम सेमेस्टर की परीक्षाओं के दौरान जो लापरवाही सामने आई है, वह पूरी उच्च शिक्षा प्रणाली के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ (Wake-up Call) है।

परीक्षा केंद्र पर ‘विषयों का भ्रम’: लापरवाही या जागरूकता की कमी?

हैरानी की बात है कि कॉलेज पहुँचने वाले सैकड़ों छात्र यह तक नहीं जानते कि उनका मुख्य विषय (DSC) कौन सा है और माइनर या वैल्यू एडेड कोर्स (VAC) कौन सा।

  • गलत पेपर की तैयारी: रोजाना 100 से अधिक छात्र ऐसे मिल रहे हैं जो प्रवेश पत्र होने के बावजूद गलत दिन परीक्षा देने पहुँच रहे हैं।
  • साहित्य बनाम भाषा: संस्कृत और अंग्रेजी जैसे विषयों में छात्र ‘साहित्य’ (Literature) और ‘भाषा’ (Language) के बीच का अंतर भूलकर गलत परीक्षा केंद्रों पर बहस करते नजर आए।

75% उपस्थिति का नियम: कागजों पर सख्ती, जमीन पर ‘शून्य’

NEP के तहत 90 दिन की पढ़ाई अनिवार्य है, लेकिन हकीकत यह है कि अक्टूबर तक प्रवेश चलते रहे और दिसंबर में भी सीटें भरने के लिए पोर्टल खोला गया।

विशेषज्ञों का मत: प्रोफेसर डिगर सिंह फर्स्वाण (निदेशक, स्कूल ऑफ एजुकेशन) ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उपस्थिति के नियमों में सख्ती नहीं बरती गई, तो NEP का उद्देश्य केवल फाइलों तक सीमित रह जाएगा। बिना कक्षाओं के ‘समग्र विकास’ और ‘दक्षता’ की बातें बेमानी हैं।

समय है जागने का: केवल डिग्री नहीं, ज्ञान चुनिए

यह रिपोर्ट केवल छात्रों की गलती नहीं दिखाती, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाती है। शिक्षा केवल परीक्षा हॉल तक पहुँचने का नाम नहीं है, बल्कि विषयों की समझ और नियमितता का परिणाम है। यदि छात्र कक्षाओं से दूरी बनाएंगे, तो वे केवल कागजी डिग्री धारक बनेंगे, कुशल नागरिक नहीं।

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