उत्तराखण्ड

उत्तराखंड में क्यों बढ़ रहे हैं बच्चों के लापता होने के मामले? चौंकाने वाले आंकड़े आए सामने

देहरादून: उत्तराखंड में लगातार बच्चों के लापता होने के मामले सामने आ रहे हैं। कोई बच्चा स्कूल से घर नहीं लौट रहा, कोई खेलते-खेलते अचानक गायब हो जाता है, तो कोई बाजार से वापस आते समय रास्ते में ही लापता हो जाता है। सबसे चिंता की बात यह है कि इन मामलों में बड़ी संख्या नाबालिग बच्चियों की है। हालिया आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को उजागर कर रहे हैं और अभिभावकों के साथ-साथ प्रशासन की चिंता भी बढ़ा रहे हैं।

लगातार बढ़ रहे हैं गुमशुदगी के मामले

पिछले कुछ समय से उत्तराखंड के विभिन्न जिलों से बच्चों के लापता होने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। खासतौर पर 12 से 18 वर्ष आयु वर्ग के किशोर और किशोरियों के मामले अधिक देखने को मिल रहे हैं। कई बार बच्चे स्कूल से निकलने के बाद घर नहीं पहुंचते, जबकि कुछ मामलों में खेलते समय या बाजार से लौटते वक्त उनके लापता होने की सूचना मिलती है। इन घटनाओं ने समाज और परिवारों के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर इतने बच्चे अचानक कहां जा रहे हैं और इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

क्या है इसके पीछे की वजह?

विशेषज्ञों का मानना है कि हर गुमशुदगी का मामला एक जैसा नहीं होता। कुछ मामलों में मानव तस्करी या संगठित अपराधी गिरोहों की आशंका भी जताई जाती है, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे मामले भी सामने आते हैं जिनमें बच्चे स्वयं घर छोड़कर चले जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों पर बढ़ता मानसिक दबाव, परिवार के साथ संवाद की कमी और सोशल मीडिया का प्रभाव इसके प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं।

सोशल मीडिया और बदलती सोच का असर

डिजिटल युग में बच्चे कम उम्र में ही सोशल मीडिया, ऑनलाइन कंटेंट और ग्लैमरस लाइफस्टाइल से प्रभावित हो रहे हैं। कई बार वे आभासी दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर समझ नहीं पाते। विशेषज्ञों का कहना है कि जब माता-पिता मोबाइल फोन के उपयोग पर रोक लगाते हैं, गेम खेलने से मना करते हैं या पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह देते हैं, तो कुछ बच्चे इसे अपनी स्वतंत्रता पर रोक मान लेते हैं। नाराजगी, भावनात्मक तनाव या आवेश में वे घर छोड़ने जैसा बड़ा कदम उठा सकते हैं।

10 दिनों में 13 नाबालिगों की गुमशुदगी दर्ज

राजधानी देहरादून से सामने आए हालिया आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। पिछले 10 दिनों के भीतर शहर के विभिन्न थाना क्षेत्रों में 13 नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी के मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में ऋषिकेश, सेलाकुई और सहसपुर क्षेत्र भी शामिल हैं। लापता होने वाले अधिकांश बच्चों की उम्र 12 से 18 वर्ष के बीच बताई जा रही है, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिग लड़कियों की है।

पुलिस की सक्रियता से कई बच्चे बरामद

पुलिस प्रशासन का कहना है कि गुमशुदा बच्चों की तलाश के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं और हर मामले को गंभीरता से लिया जाता है।

पुलिस के अनुसार पिछले एक वर्ष के दौरान गुमशुदा हुए लगभग 93 प्रतिशत बच्चों को सुरक्षित बरामद कर लिया गया है। हालांकि अधिकारियों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।

परिवार और समाज की भी है जिम्मेदारी

विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए परिवारों को उनके साथ बेहतर संवाद स्थापित करना होगा। बच्चों की भावनाओं, परेशानियों और मानसिक स्थिति को समझना बेहद जरूरी है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के डिजिटल व्यवहार पर नजर रखें, लेकिन साथ ही उनके साथ भरोसेमंद रिश्ता भी बनाए रखें ताकि बच्चे अपनी समस्याएं खुलकर साझा कर सकें।

डिजिटल दौर बुरा नहीं, लेकिन जागरूकता जरूरी

तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म आज की जरूरत हैं, लेकिन बिना मार्गदर्शन और निगरानी के इनका प्रभाव बच्चों पर नकारात्मक भी पड़ सकता है। इसलिए अभिभावकों, शिक्षकों और समाज को मिलकर बच्चों को सही दिशा देने की आवश्यकता है। बच्चों के साथ नियमित संवाद, भावनात्मक सहयोग और डिजिटल जागरूकता ही उन्हें गलत फैसले लेने से रोक सकती है और सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ा सकती है।

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