पंजाब के निकाय चुनाव इस बार बेहद गर्म माहौल में संपन्न हुए। भीषण गर्मी के साथ-साथ चुनावी सियासत का पारा भी पूरे दिन चढ़ा रहा। कई जगहों पर हंगामा, हिंसा और राजनीतिक टकराव देखने को मिला। मतदान खत्म होते ही सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) ने जीत के बड़े दावे करने शुरू कर दिए, जबकि विपक्षी दलों ने भी चुनाव में बड़ा उलटफेर होने की बात कही। अब सभी की नजरें 29 मई पर टिकी हैं, जब मतपेटियां खुलेंगी और जनता का फैसला सामने आएगा। पंजाब की राजनीति में निकाय चुनाव को हमेशा बेहद अहम माना जाता है क्योंकि इसे विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल भी समझा जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंजाब के मतदाता अक्सर स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ दल पर भरोसा जताते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह मानी जाती है कि जनता विकास कार्यों के लिए सरकार और स्थानीय निकायों में तालमेल चाहती है, ताकि डबल इंजन की सरकार से विकास को गति मिल सके।
अगर पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2015 में पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन की सरकार थी। उस समय निकाय चुनाव में भी जनता ने इसी गठबंधन पर भरोसा जताया था। वहीं साल 2020 में कोविड महामारी के कारण चुनाव टाल दिए गए थे और फरवरी 2021 में मतदान कराया गया। उस दौरान राज्य में कांग्रेस की सरकार थी और निकाय चुनाव में कांग्रेस को अच्छी बढ़त मिली थी। इसी राजनीतिक ट्रेंड को देखते हुए इस बार आम आदमी पार्टी भी जीत को लेकर काफी आत्मविश्वास में नजर आ रही है। हालांकि विपक्ष ने भी इस बार सरकार को कड़ी चुनौती दी है। कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल लगातार कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, विकास कार्यों और सरकार की नीतियों को लेकर AAP सरकार पर हमलावर रहे।
इस बार चुनाव में एक और बड़ा मुद्दा रहा भीषण गर्मी। साल 2015 और 2021 में निकाय चुनाव ठंड के मौसम में हुए थे, लेकिन इस बार 42 से 44.7 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच मतदान हुआ। तेज गर्मी का असर मतदान प्रतिशत पर भी साफ दिखाई दिया। साल 2021 में जहां मतदान प्रतिशत 73.53 फीसदी था, वहीं इस बार शाम पांच बजे तक करीब 61.5 फीसदी मतदान ही दर्ज किया गया। राजनीतिक मामलों के जानकार हरबंस सिंह का मानना है कि 60 से 65 प्रतिशत मतदान को सत्ता विरोधी लहर नहीं माना जा सकता। वहीं AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में लुधियाना में दावा किया था कि पंजाब में सरकार के खिलाफ कोई एंटी इनकम्बेंसी नहीं है। दूसरी तरफ कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल के नेताओं का कहना है कि राज्य की जनता कानून व्यवस्था और सरकारी नीतियों से नाराज है और इसका असर चुनाव नतीजों में देखने को मिलेगा।
निकाय चुनाव में इस बार मुख्य मुकाबला सरकार के चार साल के रिपोर्ट कार्ड और विपक्ष की घेराबंदी के बीच दिखाई दिया। आम आदमी पार्टी ने विकास कार्यों, मुफ्त सुविधाओं और डबल इंजन सरकार के फायदों को चुनावी मुद्दा बनाया, जबकि विपक्ष ने भ्रष्टाचार, बिगड़ी कानून व्यवस्था और जनसमस्याओं को लेकर सरकार को घेरने में पूरी ताकत झोंक दी। अब सभी की नजरें 29 मई को आने वाले नतीजों पर हैं। यह चुनाव सिर्फ स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आठ महीने बाद होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने वाला बड़ा राजनीतिक संकेत भी माना जा रहा है।