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देहरादून में अंतरराष्ट्रीय मंथन: हिमालयी भूस्खलन रोकने के लिए नॉर्वे की तकनीक का सहारा।

हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते भूस्खलन के खतरों और असुरक्षित विकास की चुनौतियों के बीच उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक महत्वपूर्ण मंथन शुरू हुआ है। उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (ULMMC) द्वारा आयोजित पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम (02-06 फरवरी 2026) का शुभारंभ सोमवार को हुआ। इसमें भारत सहित नेपाल, भूटान और नॉर्वे के भू-वैज्ञानिक और विशेषज्ञ आपदा-सक्षम बुनियादी ढांचे पर चर्चा कर रहे हैं।

हिमालय की संवेदनशीलता और सुरक्षित विकास

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए आपदा प्रबंधन सचिव श्री विनोद कुमार सुमन ने जोर दिया कि हिमालय भूगर्भीय रूप से बेहद कच्चा और संवेदनशील है। यहाँ भारी वर्षा और भूकंपीय गतिविधियों के कारण भूस्खलन का खतरा निरंतर बना रहता है। उन्होंने कहा कि:

  • सड़कों, पुलों और जलापूर्ति जैसे बुनियादी ढांचे के लिए लचीले इंजीनियरिंग समाधान अपनाना अनिवार्य है।

  • विभिन्न विभागों की तकनीकी क्षमता को बढ़ाकर आपदा के बाद की रिकवरी को और अधिक प्रभावी बनाना होगा।

नॉर्वे की तकनीक और अंतरराष्ट्रीय अनुभव

कार्यशाला में नॉर्वे के प्रसिद्ध भू-तकनीकी अनुसंधान संस्थान (NGI) के विशेषज्ञ डॉ. हाकोन हेयर्डल प्रशिक्षण दे रहे हैं। उनके 32 वर्षों के अनुभव का लाभ उत्तराखंड को मिलेगा। प्रशिक्षण के मुख्य तकनीकी बिंदु निम्नलिखित हैं:

  1. सॉइल नेलिंग (Soil Nailing): मिट्टी के ढलानों को लोहे की रॉड से मजबूती प्रदान करना।

  2. जल निकासी उपाय: पहाड़ों के भीतर पानी के रिसाव को रोककर भूस्खलन कम करना।

  3. उपग्रह मानचित्रण: सैटेलाइट डेटा के जरिए संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करना।

व्यावहारिक अध्ययन: मनसा देवी भूस्खलन क्षेत्र का भ्रमण

विश्व बैंक के प्रतिनिधि श्री अनुप करण्थ ने भी आपदा न्यूनीकरण पर उत्तराखंड के प्रयासों की सराहना की। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने हरिद्वार स्थित मनसा देवी भूस्खलन क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया। यहाँ विशेषज्ञों ने वास्तविक परिस्थितियों में जोखिम विश्लेषण और ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (पूर्व चेतावनी प्रणाली) के व्यावहारिक पहलुओं को समझाया।

कार्यशाला के 5 प्रमुख लक्ष्य

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: भूस्खलन के कारणों की गहराई से वैज्ञानिक समझ विकसित करना।

  • तकनीकी सुदृढ़ीकरण: लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और अन्य विभागों के इंजीनियरों की क्षमता बढ़ाना।

  • समन्वय: विभिन्न संस्थानों (जैसे वाडिया संस्थान, GSI, IIRS) के बीच अनुभव साझा करना।

  • टिकाऊ डिजाइन: सड़कों और पुलों के लिए ऐसे डिजाइन तैयार करना जो आपदा झेल सकें।

  • सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय स्तर पर लोगों को आपदा के प्रति जागरूक और तैयार करना।

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