देहरादून फुटहिल्स में अवैध निर्माण पर हाईकोर्ट सख्त, MDDA और जैव विविधता बोर्ड से एक सप्ताह में मांगा जवाब

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून जिले की पहाड़ियों की तलहटी (फुटहिल्स) और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में कथित अवैध निर्माण को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए संबंधित विभागों से कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA), उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड तथा अन्य संबंधित पक्षों को एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
लंबित जवाब पर हाईकोर्ट की नाराजगी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि इस जनहित याचिका को दायर हुए लगभग छह वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कई विभागों ने अब तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल नहीं किया है। अदालत पहले भी कई बार संबंधित विभागों को जवाब प्रस्तुत करने के लिए समय दे चुकी है, बावजूद इसके आवश्यक रिपोर्ट और जवाब दाखिल नहीं किए गए। याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि 2 मई 2021 को हाईकोर्ट ने एमडीडीए और नगर निगम आयुक्त को संबंधित क्षेत्रों का स्थलीय निरीक्षण (स्पॉट इंस्पेक्शन) कर रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। हालांकि, निर्धारित समय बीत जाने के बाद भी संबंधित रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई।
भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में बढ़ते निर्माण पर चिंता
याचिकाकर्ता का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में देहरादून की पहाड़ियों की तलहटी में अवैध और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियां और अधिक बढ़ गई हैं। इन संवेदनशील क्षेत्रों के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, जिससे पर्यावरणीय संतुलन और भू-सुरक्षा दोनों पर खतरा बढ़ता जा रहा है। अदालत से अनुरोध किया गया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए नियमित सुनवाई कर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा जा सके।
2021 में दायर हुई थी जनहित याचिका
यह जनहित याचिका देहरादून निवासी रेनू पॉल द्वारा वर्ष 2021 में दायर की गई थी। याचिका में मांग की गई है कि देहरादून जिले के फुटहिल क्षेत्रों, विशेषकर 30 डिग्री या उससे अधिक ढलान वाले और भूस्खलन संभावित इलाकों में हो रहे निर्माण कार्यों पर प्रभावी रोक लगाई जाए। याचिका में कहा गया है कि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी करते हुए की जा रही हैं। चूंकि ये क्षेत्र पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं, इसलिए किसी भी निर्माण की अनुमति वैज्ञानिक अध्ययन और विस्तृत जांच के बाद ही दी जानी चाहिए।
नियमित निगरानी और संरक्षण की मांग
याचिका में यह भी आग्रह किया गया है कि ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों की समय-समय पर विशेषज्ञों द्वारा जांच कराई जाए तथा भविष्य में किसी भी प्रकार के अनियोजित निर्माण को रोकने के लिए सख्त निगरानी व्यवस्था लागू की जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में भूस्खलन और पर्यावरणीय नुकसान का खतरा और बढ़ सकता है।


