देहरादून: वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के वार्षिक रिसर्च सेमिनार में वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता से जुड़े कई महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किए गए। वैज्ञानिकों ने मानव-वन्यजीव संघर्ष, बदलते आवास, जैव विविधता, पर्यावरणीय बदलाव, वन्यजीवों की आबादी के आकलन और प्रजातियों के पुनर्स्थापन जैसे विषयों पर अपने अध्ययन साझा किए। सेमिनार में वैज्ञानिकों की ओर से फैन-थ्रोटेड लिजार्ड की दो नई प्रजातियों, बुश फ्रॉग की 13 नई प्रजातियों और भारत में पहली मड-नेस्टिंग फ्रॉग प्रजाति की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम के दौरान वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता से संबंधित पांच पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।
संरक्षण का दायरा अब सिर्फ प्रजातियों तक सीमित नहीं
विशेषज्ञों ने कहा कि मौजूदा दौर में वन्यजीव संरक्षण को केवल किसी एक प्रजाति की सुरक्षा के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए वन्यजीवों के आवास, पर्यावरणीय बदलाव, विकास गतिविधियों, स्थानीय समुदायों और नई तकनीकों के प्रभाव को भी समझना जरूरी है। WII के निदेशक डॉ. जीएस भारद्वाज ने कहा कि वार्षिक रिसर्च सेमिनार देश की जैव विविधता के संरक्षण के लिए संस्थान में किए जा रहे विभिन्न शोध कार्यों को साझा करने का मंच है। उनके मुताबिक, शोधकर्ताओं को विशेषज्ञों से मिलने वाला फीडबैक उनके अध्ययन की गुणवत्ता और उपयोगिता को बेहतर बनाने में मदद करता है।
एक साल में नई प्रजातियों से जुड़े कई शोध
WII की डीन डॉ. रुचि बडोला ने संस्थान की पिछले एक वर्ष की शोध उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि WII के वैज्ञानिकों ने इस अवधि में फैन-थ्रोटेड लिजार्ड की दो नई प्रजातियां और बुश फ्रॉग की 13 नई प्रजातियां रिपोर्ट की हैं। इसके साथ ही भारत से पहली मड-नेस्टिंग फ्रॉग प्रजाति की रिपोर्ट भी सामने रखी गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसी खोजें देश की जैव विविधता को बेहतर ढंग से समझने और भविष्य की संरक्षण रणनीतियां तैयार करने में उपयोगी हो सकती हैं।
विकसित भारत-2047 के लिए तैयार होगा वाइल्डलाइफ विजन प्लान
WII की ओर से विकसित भारत-2047 के संदर्भ में वाइल्डलाइफ विजन प्लान तैयार करने पर भी काम किया जा रहा है। इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस के महानिदेशक डॉ. एसपी यादव ने वन्यजीव संरक्षण में आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। उन्होंने मानव-वन्यजीव संघर्ष और वन्यजीवों के आवास में हो रहे बदलाव को प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया।
इन विषयों पर हुए शोध
सेमिनार के तकनीकी सत्रों में वन्यजीवों की Recovery, Reintroduction and Population Resilience यानी पुनर्प्राप्ति, पुनर्स्थापन और आबादी की मजबूती से जुड़े अध्ययन प्रस्तुत किए गए।
इसके अलावा निम्न विषयों पर भी शोध और प्रस्तुतियां हुईं—
- Species, Habitats and Emerging Conservation Challenges
- Landscape Change, Connectivity and Development
- Population Estimation
- Biodiversity Under Environmental Change
- Human-Wildlife Coexistence and Conflict
शोधकर्ताओं ने यह समझने पर भी जोर दिया कि बदलते लैंडस्केप और विकास गतिविधियां वन्यजीवों के आवास तथा उनके बीच संपर्क को किस तरह प्रभावित कर रही हैं। वहीं आबादी के आकलन से जुड़े अध्ययनों में विभिन्न प्रजातियों की संख्या और उनकी सामाजिक संरचना को समझने पर ध्यान दिया गया।
पांच महत्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण
सेमिनार के उद्घाटन सत्र में WII के फैकल्टी और शोधकर्ताओं द्वारा तैयार की गई पांच पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया। इनमें शामिल हैं—
- River Rhythm: Learning by Doing Methods
- Experientia: A Book on Experimental Learning – Beyond Classrooms
- A Field Guide to the Tiger Beetles of Ramganga Catchment
- Status of the Clouded Leopard in Select Sites of Northeastern India 2026
- Pan-India Assessment of Endangered Species – Nicobar Megapode
सेमिनार में प्रस्तुत शोधों और चर्चाओं के जरिए भारत में वन्यजीव संरक्षण के बदलते स्वरूप, नई तकनीक की संभावनाओं और जैव विविधता के सामने उभर रही चुनौतियों पर विशेषज्ञों ने अपने अनुभव और अध्ययन साझा किए।