आखिर कहा है गणपति बप्पा का जन्म स्थल, किस स्थान में भगवान शिव ने क्रोधित होकर गणेश जी के सिर को धड़ किया था अलग जानिए

वक्र तुंड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ: ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥

 

हर शुभ काम को करने से पहले व देवी देवताओं की पूजा से पहले सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है। ग्रंथों में गणपति जी के पूज्‍य होने के पथक-पथक कारण है। लेकिन किसी भी मांगलिक कार्य में इनकी पूजा को सर्वश्रेष्‍ठ स्‍थान दिया गया है। शुभ कार्यों में सबसे पहले पूजे जाने वाले गणेश भगवान जी के बारे में आज हम आपको ऐसे तथ्य बताने जा रहे हैं, जो आप ने शायद ही सुना होगा, कहते हैं गणपति बप्पा की पूजा की जाए तो बौध्दिक क्षमता के साथ-साथ विवेक पर फर्क पड़ता हैं। उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है, मान्यता है कि देवभूमि उत्तराखंड के डोडीताल कैलासू में ही भगवान भोलेनाथ के पुत्र भगवान गणेश का जन्म हुआ था। वहीं उत्तराखंड के डोडीताल कैलासू लोकगीत वहां के घर घर में गाया जाता है, इस लोकगीत से भगवान गणेश का बहुत पुराना नाता बताया जाता हैं।

उत्तराखंड में डोडीताल गणेश मंदिर दिव्य स्थान उत्तरकाशी जिले में संगम चिट्टी से लगभग 23 किलोमीटर दूर स्थित है। वहीं खूबसूरती और रोमांच का अद्भुत संगम डोडीताल झील, डोडीताल हिमालय की गोद में बसा छोटा सा हिल स्टेशन भी है।  मान्यता है कि जब मां पार्वती यहां पर स्नान करने गई थीं तो उन्होंने अपने उबटन से एक बालक की प्रतिमा का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए थे। जिससे भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई। स्कन्द पुराण के केदार खंड में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है।

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भगवान गणेश को यहां के स्थानीय बोली में डोडी राजा भी बुलाया जाता है। स्कंद पुराण के केदारखंड में भगवान गणेश को डुंडीसर नाम से भी पुकारा गया है, जो डोडीताल के नाम से लिया गया है। जैसे की भारत में हर राज्य में भगवानों को अलग- अलग नाम से पुकारा जाता हैं, जैसे गणपति बप्पा को कहीं गणेश जी तो कहीं सिध्दी विनायक, चार भुजा धारी, एकदन्त तो वैसे ही डोडीताल में मां पार्वती को मां अन्नपूर्णा के नाम से बुलाया जाता है। भगवान गणेश के साथ यहां से एक और कहानी जुड़ी हुई है। यहीं वो जगह है जहां भगवान गणेश का सिर भगवान शिव ने काट दिया था।

 

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मान्यता के अनुसार जब मां अन्नपूर्णा डोडीताल में स्नान के लिए आई थीं, तो उन्होंने भगवान गणेश को द्वारपाल के रूप में झील के बाहर रहने को कहा था। साथ ही मां अन्नपूर्णा ने गणेश जी को आदेश दिया था कि वे किसी को भी अंदर न आने दे। कहा जाता है कि यहीं पर भगवान शिव को भगवान गणेश ने डोडीताल जाने से रोक दिया था। जिससे भगवान शिव क्रोधित होकर गणेश जी के सिर को धड़ से अलग कर दिया था।

मुद्गल ऋषि के द्वारा लिखे गए मुद्गल पुराण में डोडीताल का जिक्र भगवान गणेश की जन्मभूमि के साथ भगवान शिव के साथ उनकी युद्ध स्थल के रूप में है। डोडीताल में स्थित डोडीताल मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। वहीं त्रियुगीनारायण मंदिर में भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था। उत्तराखंड को मां पार्वती का मायका भी कहा जाता है। यहां हर 12 साल में एक बार नंदा देवी राजजात यात्रा निकाली जाती है। इस दौरान मां पार्वती अपने मायके आती हैं। भगवान शिव और पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित यहां एक कार्तिक स्वामी मंदिर भी है।

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