भारतीय किशोरों और युवाओं के बीच कोरियन ड्रामा (K-Drama), संगीत (K-Pop) और कोरियन संस्कृति का बढ़ता आकर्षण अब ‘लत’ के साथ-साथ एक गंभीर मनोवैज्ञानिक खतरे में बदल गया है। गाजियाबाद में तीन बहनों द्वारा कोरियन गेम के चलते की गई सामूहिक आत्महत्या की घटना ने विशेषज्ञों और अभिभावकों की नींद उड़ा दी है।
केस स्टडी: भारतीय लड़कों से नफरत और कोरिया जाने की जिद
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज की वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. जया नवानी ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उनके पास आए मामलों में चौंकाने वाली प्रवृत्तियां देखी गई हैं:
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भारतीयों के प्रति नफरत: कुछ किशोरियों के मन में भारतीय मूल के लड़कों के प्रति गहरी नफरत पैदा हो गई है। वे केवल कोरियन मूल के व्यक्ति से शादी करने या वहीं बसने की जिद कर रही हैं।
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BTS कैंप की लत: एक किशोरी अपने परिवार पर दक्षिण कोरिया जाकर ‘BTS कैंप’ में शामिल होने के लिए दबाव बना रही थी।
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पहचान का संकट: बच्चे अपना नाम बदलकर कोरियन रख रहे हैं और अपनी जड़ों से कट रहे हैं।
क्यों हो रहा है ऐसा? क्या कहता है विज्ञान?
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या केवल शौक नहीं बल्कि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से जुड़ी है:
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डोपामाइन का खेल: डॉ. नवानी के अनुसार, उत्तेजक कोरियन कंटेंट देखने से मस्तिष्क में ‘डोपामाइन’ (खुशी देने वाला हार्मोन) का स्तर बार-बार बढ़ता है, जिससे बच्चों को इसकी लत लग जाती है।
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फेल होता ‘ब्रेक सिस्टम’: एम्स ऋषिकेश के मनोरोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. रवि गुप्ता का कहना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम मस्तिष्क के ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ को नुकसान पहुंचाता है। यह हिस्सा दिमाग का ‘ब्रेक’ है जो सही-गलत का फैसला करता है। इसके कमजोर होने से बच्चे ‘इम्पल्सिव’ (आवेगपूर्ण) होकर आत्महत्या जैसे गलत कदम उठा लेते हैं।
अभिभावकों के लिए ‘रेड फ्लैग’ (चेतावनी के संकेत)
अगर आपके बच्चे में ये बदलाव दिख रहे हैं, तो सावधान हो जाएं:
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अचानक खान-पान, पहनावे या भाषा (कोरियन शब्दों का प्रयोग) में बदलाव।
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सोशल मीडिया पर अजनबियों के साथ टास्क-आधारित गेम खेलना।
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परिवार और पुराने दोस्तों से कटकर अकेले कमरे में रहना।
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खुद को कोरियन पहचान (जैसे- कोरियन नाम रखना) से जोड़ना