उत्तराखण्ड

उत्तराखंड में 100 से ज्यादा दर्जाधारी मंत्री! क्या बढ़ रहा है सरकारी खर्च?

देहरादून: उत्तराखंड में एक बार फिर दर्जाधारी मंत्रियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। प्रदेश में विभिन्न बोर्ड, निगम, आयोग और समितियों में बड़ी संख्या में नियुक्तियां किए जाने के बाद दर्जाधारी मंत्रियों की संख्या 100 के पार पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या उत्तराखंड जैसे सीमित संसाधनों और छोटे बजट वाले राज्य को इतनी बड़ी संख्या में दर्जाधारी मंत्रियों की वास्तव में आवश्यकता है या फिर यह केवल राजनीतिक संतुलन साधने की कवायद है। दर्जा प्राप्त मंत्री या दायित्वधारी मंत्री कोई संवैधानिक पद नहीं होता। इन पदों पर नियुक्त होने वाले व्यक्ति न तो सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं और न ही वे कैबिनेट मंत्री या राज्य मंत्री की तरह शपथ लेते हैं। राज्य सरकार अपनी आवश्यकता और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न बोर्डों, निगमों, परिषदों और समितियों में जिम्मेदारियां सौंपने के लिए ऐसे पदों पर नियुक्तियां करती है। नियुक्ति के साथ उन्हें कुछ प्रशासनिक सुविधाएं और प्रोटोकॉल भी उपलब्ध कराए जाते हैं।

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद लंबे समय तक जिला पंचायत अध्यक्षों और अन्य पदाधिकारियों को राज्य मंत्री का दर्जा देने की व्यवस्था सीमित रही। हालांकि वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार ने जिला पंचायत अध्यक्षों को पुनः राज्य मंत्री का दर्जा देने का निर्णय लिया। इसके बाद विभिन्न स्तरों पर दर्जाधारी नियुक्तियों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी तेज हो गईं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई बार चुनाव में टिकट नहीं मिलने वाले नेताओं, संगठन के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं या पार्टी के भीतर नाराज चल रहे नेताओं को संतुष्ट करने के लिए भी ऐसे पदों का उपयोग किया जाता है। इससे सरकार संगठन और सत्ता के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती है। साथ ही क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को साधने में भी इन नियुक्तियों की भूमिका मानी जाती है।

दर्जाधारी मंत्रियों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी समय-समय पर बहस होती रही है। विभिन्न नियमों के तहत उन्हें मानदेय, वाहन सुविधा, कार्यालय संचालन, स्टाफ और संचार संबंधी कुछ सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। इसके अलावा सरकारी बैठकों और प्रशासनिक कार्यक्रमों में उन्हें प्रोटोकॉल के अनुसार स्थान भी दिया जाता है। इन सुविधाओं पर होने वाले खर्च को लेकर विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठन सवाल उठाते रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि जब राज्य के सामने रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और आधारभूत सुविधाओं जैसी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं, तब सरकारी संसाधनों का उपयोग केवल राजनीतिक नियुक्तियों के लिए किया जाना उचित नहीं माना जा सकता। उनका तर्क है कि जनता के टैक्स से मिलने वाले संसाधनों का उपयोग जनहित और विकास कार्यों पर प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए।

वहीं सरकार और समर्थक पक्ष का कहना है कि विभिन्न बोर्डों, निगमों और समितियों के सुचारू संचालन के लिए अनुभवी लोगों की आवश्यकता होती है। ऐसे में इन पदों पर नियुक्तियां प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और सरकार की योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने में मदद करती हैं। उनका मानना है कि दायित्वधारी पद केवल राजनीतिक नहीं बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों से भी जुड़े होते हैं। उत्तराखंड में दर्जाधारी मंत्रियों की बढ़ती संख्या को लेकर बहस फिलहाल जारी है। आने वाले समय में यदि इनकी संख्या 100 के आंकड़े को पार करती है तो यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों से निकलकर जनता के बीच भी चर्चा का विषय बन सकता है। अब देखना होगा कि सरकार इन नियुक्तियों को किस तरह उचित ठहराती है और विपक्ष इस मुद्दे को किस प्रकार उठाता है।

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