करोड़ों की परियोजनाएं, लेकिन जमीन के अभाव में अटके एसटीपी

उत्तराखंड में नदियों को प्रदूषण से बचाने और सीवरेज के गंदे पानी के उपचार के लिए बनाई गई कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं वर्षों से अधर में लटकी हुई हैं। स्थिति यह है कि करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत होने के बावजूद कुछ सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) आज तक निर्माण चरण में भी नहीं पहुंच पाए हैं। इसका सबसे बड़ा कारण इन परियोजनाओं के लिए उपयुक्त भूमि का उपलब्ध न होना बताया जा रहा है। प्रदेश में घरों, होटलों, बाजारों, संस्थानों और औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला सीवरेज का पानी कई स्थानों पर सीधे नदियों और जल स्रोतों में पहुंच रहा है। इससे गंगा, यमुना, टोंस, कोसी, सरयू, गौला और अन्य नदियों के प्रदूषित होने का खतरा लगातार बढ़ रहा है। इसी समस्या के समाधान के लिए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए जाते हैं, ताकि गंदे पानी का उपचार कर उसे सुरक्षित रूप से छोड़ा जा सके।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वर्ष 2015 में उत्तराखंड में केवल 24 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट थे, जबकि 2024 तक उनकी संख्या बढ़कर 69 हो चुकी है। इसके बावजूद राजधानी देहरादून में कुछ महत्वपूर्ण एसटीपी परियोजनाएं अब तक शुरू नहीं हो पाई हैं। टपकेश्वर मंदिर और गढ़ी कैंट क्षेत्र में प्रस्तावित एसटीपी के लिए आज तक भूमि तय नहीं हो सकी है। इसी तरह कैमल बैक एसटीपी परियोजना को वर्ष 2022 में स्वीकृति और बजट मिलने के बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया। वहीं आर्केडिया एसटीपी परियोजना भी भूमि चिन्हीकरण और म्यूटेशन की प्रक्रिया में फंसी हुई है। इन देरी के कारण परियोजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि देहरादून की बढ़ती आबादी और लगातार बढ़ रहे पर्यटन के कारण सीवरेज प्रबंधन की चुनौती और गंभीर होती जा रही है। यदि समय रहते इन परियोजनाओं को पूरा नहीं किया गया तो भविष्य में जल स्रोतों और नदियों पर प्रदूषण का दबाव और बढ़ सकता है। हाल ही में देहरादून के जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने परियोजनाओं में हो रही देरी को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को फटकार लगाई है। उन्होंने लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी है और परियोजनाओं की प्रगति में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन की सख्ती के बाद वर्षों से अटकी इन योजनाओं को जमीन मिल पाती है या नहीं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो करोड़ों रुपये की स्वीकृत परियोजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह सकती हैं और नदियों को प्रदूषण से बचाने का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

 

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