केदारनाथ धाम यात्रा के सफल और सुरक्षित संचालन को लेकर नैनीताल हाई कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यात्रा मार्ग पर डिप्लोमा इंजीनियरों की तैनाती न केवल न्यायसंगत है, बल्कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए अनिवार्य भी है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें विशेष ड्यूटी पर तैनाती को चुनौती दी गई थी।
विवाद क्या था? संघ का तर्क बनाम हकीकत
उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स महासंघ ने कोर्ट में दलील दी थी कि लोक निर्माण विभाग (PWD) और सिंचाई विभाग के तकनीकी विशेषज्ञों को केदारनाथ यात्रा के दौरान गैर-तकनीकी कार्यों, विशेषकर स्वच्छता (स्वच्छता अभियान) जैसे कामों में लगाया जा रहा है। संघ का कहना था कि यह उनके पद की गरिमा और कार्यक्षेत्र के विरुद्ध है।
हालांकि, सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं के पास इस दावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं था कि किसी इंजीनियर से सफाई का काम कराया गया है।
कोर्ट की दोटूक: “इंजीनियरों के पास हैं महत्वपूर्ण तकनीकी जिम्मेदारियां”
माननीय खंडपीठ ने 5 अप्रैल 2023 के सरकारी आदेश का बारीकी से अध्ययन किया और स्पष्ट किया कि इंजीनियरों को निम्नलिखित तकनीकी कार्यों के लिए तैनात किया गया है:
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भूस्खलन नियंत्रण: यात्रा मार्ग पर संवेदनशील पहाड़ियों की निगरानी और लैंडस्लाइड रोकने के उपाय।
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पैदल मार्ग सुदृढ़ीकरण: दुर्गम रास्तों की मरम्मत और श्रद्धालुओं के चलने लायक सुरक्षित बनाना।
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आपातकालीन निरीक्षण: मानसून या भारी भीड़ के दौरान तकनीकी सुरक्षा जांच करना।
अदालत ने साफ किया कि सफाई व्यवस्था का जिम्मा सुलभ इंटरनेशनल और संबंधित नगर निकायों के पास है, अतः इंजीनियरों का भ्रम निराधार है।
सरकार के अधिकार और जनहित सर्वोपरि
नैनीताल हाई कोर्ट ने अपने आदेश में शासन के अधिकारों को रेखांकित करते हुए कहा:
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कर्मचारी की जिम्मेदारी: राज्य सरकार को जनहित (Public Interest) में अपने कर्मचारियों को विशेष परिस्थितियों में कहीं भी तैनात करने का पूर्ण अधिकार है।
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अनिवार्य सेवा: केदारनाथ यात्रा की बढ़ती लोकप्रियता और भौगोलिक चुनौतियों को देखते हुए तकनीकी विशेषज्ञों की उपस्थिति अनिवार्य है।
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सुरक्षा प्राथमिकता: लाखों श्रद्धालुओं की जान-माल की सुरक्षा किसी भी विभागीय संकीर्णता से ऊपर है।