नई दिल्ली:- लंबे समय से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम कदम उठाया गया है। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई बैठक के दौरान उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के बीच परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर समझौता हुआ। छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में समझौते पर हस्ताक्षर किए। किशाऊ परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदी है और उत्तराखंड-हिमाचल प्रदेश की सीमा के क्षेत्र से होकर बहती है। परियोजना का उद्देश्य जल भंडारण, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन के साथ यमुना बेसिन के जल प्रबंधन को मजबूत करना है।
8 दशक पुरानी परियोजना को मिली नई गति
किशाऊ परियोजना की परिकल्पना कई दशक पहले की गई थी, लेकिन राज्यों के बीच लागत, पानी के बंटवारे और अन्य मुद्दों पर सहमति न बनने के कारण यह आगे नहीं बढ़ सकी। जून 2026 में केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच सहमति बनने के बाद MoU की दिशा में रास्ता साफ हुआ था। उस समय केंद्र सरकार ने कहा था कि समझौते के बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जाएगा। अब छह राज्यों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर होने से परियोजना के क्रियान्वयन की प्रक्रिया को औपचारिक आधार मिला है।
422 मेगावाट बिजली और 1,562 MCM जल भंडारण
केंद्रीय गृह मंत्रालय और पीआईबी के अनुसार किशाऊ परियोजना में टोंस नदी पर करीब 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध प्रस्तावित है। परियोजना में 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) जल भंडारण क्षमता होगी। इसके साथ करीब 422 मेगावाट जलविद्युत क्षमता का प्रावधान है। परियोजना से करीब 97,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की क्षमता विकसित होने और स्वच्छ जलविद्युत उत्पादन का लाभ मिलने की बात केंद्र सरकार ने कही है।

छह राज्यों को मिलेगा परियोजना का लाभ
किशाऊ परियोजना से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को जल संसाधन से जुड़े लाभ मिलने हैं। परियोजना के जल भंडारण का इस्तेमाल मुख्य रूप से सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के लिए किया जाना प्रस्तावित है। इससे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली समेत ऊपरी यमुना बेसिन में जल उपलब्धता को बढ़ाने का लक्ष्य है।
यमुना के पुनर्जीवन से भी जोड़ा गया है प्रोजेक्ट
किशाऊ परियोजना को यमुना नदी के प्रवाह और जल प्रबंधन से भी जोड़ा गया है। केंद्र सरकार के मुताबिक परियोजना से यमुना में स्वच्छ पानी के प्रवाह को बढ़ाने और नदी के पुनर्जीवन के प्रयासों को समर्थन मिल सकता है। यह परियोजना टोंस नदी पर बनाई जानी है, जो यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है। इसी वजह से परियोजना को ऊपरी यमुना बेसिन के व्यापक जल प्रबंधन के संदर्भ में देखा जा रहा है।

परियोजना की लागत में केंद्र की बड़ी हिस्सेदारी
केंद्र सरकार के अनुसार किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है। परियोजना के जल घटक की लागत का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाएगा, जबकि शेष 10 प्रतिशत वित्तीय भार सहभागी राज्यों के हिस्से में रहेगा। इससे पहले परियोजना को लेकर राज्यों के बीच लागत और जल हिस्सेदारी से जुड़े मतभेदों के कारण प्रक्रिया लंबे समय तक अटकी रही थी। जून में केंद्र की मध्यस्थता में इन मुद्दों पर सहमति बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई थी।
उत्तराखंड के सामने पुनर्वास और वन भूमि की चुनौती
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि परियोजना के निर्माण के साथ प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा महत्वपूर्ण रहेगा। उन्होंने प्रभावित परिवारों के उचित और सम्मानजनक पुनर्वास को राज्य सरकार की प्राथमिकता बताया। उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना के लिए वन भूमि के हस्तांतरण की आवश्यकता होगी और इसके चलते क्षतिपूरक वनीकरण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराना उत्तराखंड जैसे पर्वतीय एवं वनाच्छादित राज्य के सामने चुनौती है।
धामी ने केंद्र सरकार और सहभागी राज्यों से क्षतिपूरक वनीकरण के लिए आवश्यक भूमि चिन्हित करने में उत्तराखंड को सहयोग देने का अनुरोध किया। साथ ही उन्होंने पर्यावरण और वन संबंधी सभी निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने की बात कही।
अंतरराज्यीय सहयोग का उदाहरण
किशाऊ परियोजना छह राज्यों से जुड़ी है, इसलिए इसके क्रियान्वयन में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण रहेगा। हालिया समझौते के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए राज्यों के बीच सहमति का औपचारिक ढांचा तैयार हुआ है। किशाऊ के अलावा ऊपरी यमुना बेसिन में अन्य बहुउद्देशीय परियोजनाओं को लेकर भी केंद्र और राज्यों के बीच समझौते हुए हैं।