रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड, जिसे हम श्रद्धा से ‘देवभूमि’ कहते हैं, वहां आज एक ऐसी घटना घटी जिसने विकास के दावों और धार्मिक मर्यादाओं के बीच की खाई को उजागर कर दिया। मकर संक्रांति के पावन अवसर पर, पूरे 15 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद, अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज की देव डोली अपने भक्तों को आशीर्वाद देने निकली थी। लेकिन अफसोस, ऋषि की यह तपस्थली अब ऋषि के स्वागत के योग्य ही नहीं रही।
क्या आधुनिकता ने छीनी देव-मर्यादा? अगस्त्यमुनि का वह मैदान जिसे ऋषि की पवित्र तप भूमि माना जाता है, आज कंक्रीट और लोहे के ढांचों (स्टेडियम गेट) में ऐसा उलझा कि खुद भगवान की डोली वहां से नहीं गुजर सकी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, डोली का रुकना देव अप्रसन्नता का प्रतीक है। क्या हम विकास की अंधी दौड़ में यह भूल गए हैं कि हमारी पहचान इन परंपराओं से ही है?
व्यवस्था की हार, आस्था की जीत की पुकार: स्टेडियम के संकरे गेट के कारण डोली का रुकना और फिर नाराज होकर वापस मंदिर लौट जाना, प्रशासन और स्थानीय नेताओं के लिए एक चेतावनी है। केदारनाथ हाईवे पर लगा 4 किलोमीटर लंबा जाम केवल वाहनों का जाम नहीं था, बल्कि उन भक्त दिलों का दर्द था जो 15 साल से इस पल का इंतजार कर रहे थे।