तस्करी, यौन शोषण, बाल श्रम, भिक्षावृत्ति और किशोर अपराध जैसे गंभीर मामलों पर चिंता जताते हुए सभी विभागों के साथ समन्वय बढ़ाने का फैसला किया है। आयोग कार्यालय में आयोजित राज्य स्तरीय समन्वय बैठक में बच्चों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।
बैठक में तय किया गया कि राज्य के प्रत्येक जिले में दो से चार ऐसी संस्थाओं और आवासीय केंद्रों की पहचान की जाएगी, जहां रेस्क्यू किए गए बच्चों को सुरक्षित रूप से रखा जा सके। आयोग इन संस्थाओं को “फिट संस्था” घोषित करेगा ताकि संकट में मिले बच्चों को तत्काल सुरक्षा और संरक्षण उपलब्ध कराया जा सके। इसके साथ ही नशे की गिरफ्त में आने वाले बच्चों के उपचार के लिए हर जिला अस्पताल में दो बेड आरक्षित रखने का निर्णय लिया गया है।
आयोग ने बच्चों के खिलाफ हो रही हिंसात्मक घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस विभाग से पिछले तीन वर्षों में लापता हुए बच्चों की विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है। बैठक में सामने आए आंकड़ों के अनुसार अधिकांश बच्चे गुम होने के बाद एक या दो दिन के भीतर अपने परिवारों तक लौट आते हैं, लेकिन पिछले तीन वर्षों में 82 ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें बच्चे अब तक घर नहीं लौट सके हैं। वहीं करीब 40 बच्चों के गायब होने के पीछे आपराधिक गतिविधियों की आशंका जताई गई है।
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष गीता खन्ना ने कहा कि बच्चों को सुरक्षित, सम्मानजनक और विकास के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में त्वरित कार्रवाई, प्रभावी निगरानी और विभागों के बीच बेहतर सूचना आदान-प्रदान सुनिश्चित किया जाएगा। आयोग का उद्देश्य बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर रोक लगाना और हर बच्चे को सुरक्षित भविष्य प्रदान करना है।
बैठक में संबंधित विभागों के अधिकारियों ने भी भाग लिया और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में संयुक्त रूप से कार्य करने पर सहमति जताई। आयोग ने स्पष्ट किया कि बाल संरक्षण से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाए जाएंगे।