उत्तराखण्ड

उत्तराखंड में पहली बार डिस्लेक्सिया और ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों की मैपिंग, शिक्षा और सहायता के लिए शुरू हुआ राज्यस्तरीय अभियान

देहरादून: उत्तराखंड में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की समय पर पहचान, उनकी शिक्षा और जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में राज्यस्तरीय पहल शुरू की गई है। देहरादून के झाझरा स्थित आईटीआई दून संस्कृति स्कूल में विशिष्ट अधिगम अक्षमता यानी Specific Learning Disability (Dyslexia) और Autism से प्रभावित बच्चों के लिए राज्यस्तरीय मैपिंग अभियान का शुभारंभ किया गया। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने बुधवार को कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस पहल का उद्देश्य ऐसे बच्चों की पहचान कर उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा, परामर्श, विशेषज्ञ सहायता और अन्य जरूरी संसाधनों तक उनकी पहुंच को बेहतर बनाना है। कार्यक्रम में राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त), शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत, पूर्व सांसद एवं डिस्लेक्सिया सोसायटी उत्तराखंड के अध्यक्ष तरुण विजय सहित विशेषज्ञ, शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी मौजूद रहे।

बच्चे की कठिनाई को उसकी पहचान नहीं, जरूरत के रूप में समझने पर जोर

कार्यक्रम में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को लेकर समाज की सोच में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया गया। राज्यपाल गुरमीत सिंह ने कहा कि बच्चे की किसी कठिनाई को उसकी पहचान या सीमा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे ऐसी विशेष आवश्यकता के रूप में समझना चाहिए जिसके लिए समय पर उचित सहयोग उपलब्ध कराया जा सके। उन्होंने कहा कि मैपिंग का उद्देश्य केवल बच्चों की संख्या जुटाना नहीं होना चाहिए। इससे यह समझने में मदद मिलनी चाहिए कि किस क्षेत्र में कितने बच्चों को किस तरह की शैक्षिक, विशेषज्ञ और अन्य सहायता की जरूरत है। राज्यपाल ने यह भी कहा कि मैपिंग से प्राप्त जानकारी को आगे काउंसलिंग, विशेषज्ञ हस्तक्षेप, प्रशिक्षण और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता से जोड़ना जरूरी है। खास तौर पर पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों तक विशेषज्ञ सेवाएं पहुंचाना अभियान की महत्वपूर्ण जरूरतों में शामिल है।

शिक्षकों को बनाया जाएगा पहचान प्रक्रिया की अहम कड़ी

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान में स्कूल और शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कई बार बच्चा पढ़ने, लिखने, गणितीय अवधारणाओं को समझने या सामाजिक संवाद में कठिनाई का सामना करता है, लेकिन उसकी वास्तविक आवश्यकता समय पर पहचान में नहीं आ पाती। इसी वजह से अभियान में शिक्षकों को संवेदनशील और प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के अनुसार, राज्य के विद्यालयों में दिव्यांग बच्चों के लिए 200 शिक्षकों की नियुक्ति की गई है। उन्होंने इसे समावेशी शिक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि शिक्षक बच्चों की क्षमताओं को पहचानकर उनके विकास में मदद कर सकते हैं। ऐसी व्यवस्था में शिक्षक शुरुआती स्तर पर किसी बच्चे की सीखने संबंधी कठिनाई को पहचानने के बाद अभिभावकों और विशेषज्ञों के साथ समन्वय कर सकते हैं। इससे जरूरत के मुताबिक आगे की सहायता तक बच्चे को पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

झाझरा स्कूल में बच्चों से मिले रामदास अठावले

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री रामदास अठावले ने स्कूल परिसर का निरीक्षण किया और विद्यार्थियों से बातचीत की। उन्होंने विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा और उनके विकास के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया। अठावले ने दिव्यांगजनों की क्षमताओं का उल्लेख करते हुए पैरालंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि दिव्यांगता को किसी व्यक्ति की प्रतिभा के आकलन का एकमात्र आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने स्कूल परिसर में अतिरिक्त सुविधाओं और शिक्षकों के लिए सहायता उपलब्ध कराने के संबंध में भी आश्वासन दिया। कार्यक्रम के दौरान पूर्व सांसद तरुण विजय के लंबे समय से जनजातीय बच्चों की शिक्षा और अवसरों के लिए किए जा रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया गया।

मैपिंग के बाद सहायता तक पहुंचाना होगी अगली चुनौती

राज्यस्तरीय मैपिंग अभियान की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पहचान के बाद बच्चों को आवश्यक सेवाएं कितनी प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराई जाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी बच्चे में Specific Learning Disability या Autism की पहचान के बाद केवल स्कूल में उसका नाम दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। बच्चे की जरूरत के अनुसार शिक्षण पद्धति, विशेषज्ञ परामर्श, अभिभावकों का मार्गदर्शन और आवश्यक सहायक सेवाएं भी जरूरी हो सकती हैं। राज्यपाल ने भी कार्यक्रम में इसी दिशा की ओर संकेत करते हुए कहा कि मैपिंग शुरुआत है, अंतिम लक्ष्य नहीं। मैपिंग से मिलने वाली जानकारी को लगातार पहचान, काउंसलिंग, प्रशिक्षण और सहायता की व्यवस्था से जोड़ना होगा।

पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों पर विशेष ध्यान की जरूरत

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों तक विशेषज्ञ सेवाओं की पहुंच एक महत्वपूर्ण विषय है। कई पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य और विशेष शिक्षा से जुड़ी सेवाओं तक पहुंच मैदानी क्षेत्रों की तुलना में चुनौतीपूर्ण हो सकती है।ऐसे में राज्यस्तरीय मैपिंग से यदि क्षेत्रवार जरूरतों की स्पष्ट तस्वीर सामने आती है, तो भविष्य में संसाधनों और विशेषज्ञ सेवाओं की योजना बनाने में मदद मिल सकती है। राज्यपाल ने भी अभियान के तहत पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों तक समय पर विशेषज्ञ सहायता पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

समाज कल्याण विभाग की योजनाओं की भी समीक्षा

कार्यक्रम के साथ केंद्रीय राज्य मंत्री रामदास अठावले ने समाज कल्याण विभाग से जुड़ी योजनाओं और राज्य में उनके क्रियान्वयन की समीक्षा भी की। इस दौरान केंद्र सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं और उनके राज्य में लाभार्थियों तक पहुंचने का उल्लेख किया गया। जन-धन योजना के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 23 सितंबर 2026 तक देश में 59.20 करोड़ से अधिक जन-धन खाते दर्ज थे। उत्तराखंड में इन खातों की संख्या 41,56,922 थी। बैठक में दिव्यांगजन कल्याण, सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों से संबंधित योजनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने तथा पात्र लोगों तक लाभ पहुंचाने पर भी चर्चा की गई।

शिक्षा, पहचान और पुनर्वास को एक साथ जोड़ने की जरूरत

उत्तराखंड में शुरू किया गया यह मैपिंग अभियान विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान के लिए एक राज्यस्तरीय आधार तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पहल है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव तभी सामने आएगा जब पहचान के बाद बच्चों को उनकी जरूरत के अनुसार शिक्षा, विशेषज्ञ सहायता, परामर्श और पुनर्वास सेवाएं भी नियमित रूप से उपलब्ध कराई जाएं। अभियान के दौरान सामने आया संदेश स्पष्ट है कि किसी बच्चे की सीखने संबंधी कठिनाई को उसकी क्षमता का अंतिम पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। समय पर पहचान और उचित सहयोग के जरिए बच्चों को उनकी क्षमताओं के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर दिया जा सकता है। राज्य सरकार, स्कूलों, शिक्षकों, अभिभावकों, विशेषज्ञों और सामाजिक संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय इस पूरी प्रक्रिया की अहम कड़ी रहेगा। खासकर उत्तराखंड के पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों में इस तरह की सेवाओं की पहुंच बढ़ाना अभियान की दीर्घकालिक सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगा।

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