अंकिता हत्याकांड: न्याय की आवाज़ या आपसी रंजिश का शोर? किरदारों की भीड़ में अकेली पड़ी ‘बेटी’।

अंकिता भंडारी हत्याकांड पर आपकी यह रिपोर्ट बेहद मार्मिक और कड़वी सच्चाई को बयां करती है। न्याय की यह लड़ाई जिस तरह निजी महत्वाकांक्षाओं और सोशल मीडिया के कीचड़ में फंसी है, वह पूरे उत्तराखंड के लिए चिंता का विषय है।

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अंकिता भंडारी हत्याकांड: इंसाफ की मशाल या आपसी रंजिश की ढाल? सोशल मीडिया के शोर में कहीं खो न जाए ‘देवभूमि की बेटी’ का दर्द

देहरादून। उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी के लिए न्याय की जो गूंज सड़कों से शुरू होकर सत्ता की दहलीज तक पहुंची थी, वह आज सोशल मीडिया के शोर और निजी आरोपों के दलदल में फंसती नजर आ रही है। जिस मामले में पूरे प्रदेश ने एक सुर में ‘इंसाफ’ की मांग की थी, आज वहां केवल ‘इल्जामों’ की राजनीति शेष रह गई है। सवाल यह है कि क्या किरदारों की इस लंबी फेहरिस्त में अंकिता का नाम सिर्फ एक मोहरा बनकर रह गया है?

मुद्दे से भटकी न्याय की लड़ाई

शुरुआत में यह मामला सिस्टम की खामियों और ‘वीआईपी’ संस्कृति के खिलाफ एक बड़ी जंग था। लेकिन धीरे-धीरे इस केस में उर्मिला सनावर, शालिनी आनंद, उषा राणा, और सुरेश राठौर जैसे नाम जुड़ते चले गए। अब स्थिति यह है कि सोशल मीडिया पर लाइव आकर एक-दूसरे का “काला चिट्ठा” खोलने की होड़ मची है। अंकिता को न्याय दिलाने का संकल्प अब “तू-तू मैं-मैं” और निजी दुश्मनी के अखाड़े में तब्दील हो चुका है।

सोशल मीडिया बना ‘नया कोर्ट’

आज अंकिता हत्याकांड की सच्चाई फाइलों से ज्यादा फेसबुक लाइव और व्हाट्सएप ऑडियो में घूम रही है। हर कोई खुद को सबसे बड़ा हितैषी बता रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि इस शोर में सीबीआई जांच की मांग और केस की प्रगति जैसे बुनियादी सवाल पीछे छूट गए हैं। उर्मिला सनावर के हालिया बयानों और उनके खिलाफ हो रहे हमलों ने इस मामले को पूरी तरह से व्यक्तिगत रंजिश की ओर मोड़ दिया है।

नए किरदारों का प्रवेश और कमजोर पड़ती आवाज़

केस में जैसे-जैसे महाराष्ट्र की नकाबपोश महिला और अन्य राजनीतिक चेहरों के नाम जुड़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे असली मुद्दा धुंधला होता जा रहा है। जनता अब भ्रमित है कि यह लड़ाई अंकिता के लिए है या खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए? क्या जांच एजेंसियां इस शोर के बीच किसी ठोस नतीजे पर पहुंच पाएंगी, या अंकिता की फाइल भी तारीखों के नीचे दब जाएगी?

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