उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों और वीरागंनाओं की कहानी जिन्होंने देश की आजादी के लिए दी अपने प्राणों की आहुति

 

जो शहीद हुए है उनकी जरा याद करो कुर्बानी…

 

 

आज हम आजादी की 75 वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं। इस मौके पर आईये याद करें कुछ ऐसे उत्तराखंड वीरों और वीरागंनाओं को जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। स्वतंत्रता आंदोलन में उत्तराखंड देवभूमि का भी अहम योगदान रहा है।

आजादी से पहले भारत में स्वतंत्रता आंदोलन हुए, जिस से उत्तराखंड भी अछूता नहीं रहा, वहीं प्रसिध्द कुली बेगार और डोला पालकी जैसे बड़े आंदोलन भी उत्तराखंड में हुए। वहीं आजादी के लिए कई बार उत्तराखण्डवासियों ने स्वर उठाया तो आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया।

कालू सिंह महरा

चम्पावत जिले के बिसुंग गांव के कालू सिंह महरा ने कुमाऊं क्षेत्र में क्रांतिवीर संगठन बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन चलाया, वहीं उन्हें “उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी” भी कहा जाता हैं। कुमाऊं क्षेत्र में हल्द्वानी में 17 सितम्बर 1857 को एक हजार से अधिक क्रांतिकारियों ने अधिकार किया, इस घटना के चलते अनेक क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया।

 

पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त

1870 में अल्मोड़ा में डिबेटिंग क्लब की स्थापना की और 1871 से अल्मोड़ा अखबार की शुरूआत हुई, 1903 ई0. में पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त ने हैप्पी क्लब की स्थापना की, उत्तराखंड में चल रहे आन्दोलन को संगठित करने के लिए 1912 में अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना की।

मुकुन्दी लाल अनुसूया प्रसाद बहुगुणा

गढ़वाल क्षेत्र में स्वतंत्रता आन्दोलन अपेक्षाकृत बाद में शुरू हुआ था, 1918 में बैरिस्टर मुकुन्दी लाल अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के प्रयासों से गढ़वाल कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ, 1920 में गांधी जी द्वारा शुरू किए गये असहयोग आन्दोलन में कई लोगों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया और कुमाऊं मण्डल के हजारों स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा बागेश्वर के सरयू नदी के तट पर कुली बेगार न करने की शपथ ली और इससे संबंधित रजिस्ट्री को नदी में बहा दिया था। 1929 में गांधी जी और नेहरू ने हल्द्वानी, भवाली, अल्मोड़ा, बागेश्वर व कौसानी ने सभाएं की इसी दौरान गांधी जी ने अवाश्क्तियोग नाम से गीता पर टिप्पणी लिखी।

 

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली

वहीं 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में 2/18  गढ़वाल रायफल के सैनिक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में निहत्थे अफगान स्वतंत्रता सेनानियों पर गोली चलने से इंकार कर दिया था, यह घटना पेशवार कांड के नाम से प्रसिध्द है। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रहकर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिये गिरफ्तार हुए। 1945 में इन्हें आजाद कर दिया गया। 22 दिसम्बर 1946 में कम्युनिस्टों के सहयोग के कारण चन्द्रसिंह फिर से गढ़वाल में प्रवेश कर सके। 1957 में इन्होंने कम्युनिस्ट के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा पर उसमें इन्हें सफलता नहीं मिली। 1 अक्टूबर 1979 को चन्द्रसिंह गढ़वाली का लम्बी बिमारी के बाद देहान्त हो गया। 1994 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। तथा कई सड़कों के नाम भी इनके नाम पर रखे गये।

 

 

 

 

जवाला दत्त जोशी

ज्वाला दत्त जोशी का जन्म 20 अप्रैल 1856 में हुआ था। ये पहले व्यक्ति थे जिन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस को कुमाऊं रिजन में शुरू किया था। वह एक वकील और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे।

कैप्टन नारायण सिंह नेगी

कैप्टन नारायण सिंह नेगी उत्तराखंड के मूल निवासी और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के करीबी सहयोगीयों में से एक थें। उनकी मुलाकात सुभाष चंद्र बोस से 1943 में हुई थी और इसके बाद वह बोस की आजाद हिंद फौज में शामिल हुए। कुछ समय के बाद नेता जी ने कैप्टन नारायण सिंह नेगी को अपना कमांडर बना लिया था।

विक्टर मोहन जोशी

विक्टर मोहन जोशी एक आंदोलनकारी और समाजसेवी थे। इनका जन्म 1 जनवरी 1896 में हुआ था। उन्होंने भारत के असहयोग आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी। वह गांधी के विचारों से बहुत अधिक प्रभावी थे। वह लेखन में भी अच्छे थे। 1916 में उन्होंने कुमाऊं परिषद में भी अहम भूमिका निभाई थी।

बद्रीनाथ पांडे

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने वाले बद्रीनाथ पांडे का जन्म 15 फरवरी 1882 में हुआ था। उन्होंने अपना करियर पत्रकारिता में बनाया। 1903 से 1910 में देहरादून में लीडर नामक अखबार में काम किया। भारत की आजादी के बाद वह अल्मोड़ा के संसद के सदस्य के तौर पर चुने गए।

उत्तराखंड की महिला स्वतंत्रता सेनानियों की सूची

बिश्नी देवी शाह

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कैद होने वाली उत्तराखंड की पहली महिला बिश्नी देवी शाह थीं। बिश्नी देवी का जन्म 1902 में बागेश्वर में हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए उत्तराखंड में कई लोग उनसे प्रेरित हुए। वह राष्ट्रीय आंदोलन के लिए अपने अथक प्रयासों के कारण ब्रिटिश राज की जड़ों को हिलाने में सफल रही। बिश्नी देवी में नेतृत्व करने और लड़ने की हिम्मत व ताकत थी।

उन्हें अपने देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए संघर्ष जारी रखने का विश्वास भी था, बावजूद इसके कि उन्होंने अंग्रेजों से कितनी विपत्तियों का सामना किया। उनके नेतृत्व और अपने आप में उनके विश्वास के परिणामस्वरूप, वह आज भारत के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

चंद्रावती लखनपाली

चंद्रावती लखनपाली भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की एक प्रतिष्ठित महिला थी। उन्होंने एमकेपी इंटर कॉलेज का नेतृत्व किया था, वे एक बहादुर महिला थी। कैथरीन मेयो की पुस्तक “मदर इंडिया” में शामिल यूरोप और अमेरिका में भारतीयों के रूढ़िवादी चित्रण से वह भयभीत थी। जिसके बाद लखनपाली को “मदर इंडिया का जवाब” नामक पुस्तक में अपनी प्रतिक्रिया लिखने के लिए प्रेरित किया, जो गुरुकुल कांगड़ी में प्रकाशित हुई थी।

गौरा देवी

गौरा देवी का जन्म वर्ष 1925 को चमोली जिले के लता गांव में हुआ। वह उत्तराखंड की प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी महिलाओं की लिस्ट में शामिल है। उन्होंने मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही अपना जीवन देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। वह वन बचाओ के लिए ‘चिपको आंदोलन’ के लिए भी जानी जाती हैं।

 

दीपा नौटियाल

दीपा नौटियाल का जन्म 1917 को पौड़ी गढ़वाल के एक गरीब परिवार में हुआ। दीपा को टिंचरी माई के नाम से भी जाना जाता है। वह बचपन से ही महात्मा गांधी जी के आंदोलनों से काफी प्रभावित थीं। वह दांडी यात्रा में शामिल हुईं। उनके पति गणेश राम सेना में सिपाही थे। उन्होंने अपने ग्रह राज्य में लोगों से ‘शराब न पीने’ को लेकर कई मुहिम चलाई।

शर्मादा त्यागी

नमक सत्याग्रह आंदोलन के दौरान, शर्मादा त्यागी ने अपने गृहनगर देहरादून में एक अभियान का नेतृत्व किया। उनके पति महावीर त्यागी गांधी के शिष्य थे। इन्हें देहरादून में महिलाओं के बीच नमक सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व करने का श्रेय दिया जाता है। शर्मादा गांधी से बहुत प्रभावित थी, उन्होंने अक्टूबर 1929 में गांधी की दून यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जब उन्होंने कन्या गुरुकुल में एक सार्वजनिक रैली में भाषण दिया था, जिसने वहां एकत्रित युवा लड़कियों की बड़ी भीड़ को प्रेरित किया था।

सविनय अवज्ञा आंदोलन भड़क में विरोध प्रदर्शन करने के लिए शर्मादा ने जनसभाओं का आयोजन किया। अभियान के लिए व्यापक समर्थन जुटाने के लिए एक सार्वजनिक सभा के दौरान 1930 में शर्मादा को हिरासत में लाया गया था।

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