उत्तराखण्ड

जॉर्ज एवरेस्ट टोल विवाद: हाई कोर्ट के आदेश की उड़ी धज्जियां, क्या प्रशासन भी है शामिल?

एक तरफ जहाँ पूरा देश गणतंत्र दिवस पर संविधान के सम्मान की कसमें खा रहा है, वहीं मसूरी के पास ऐतिहासिक जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट मार्ग पर कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Nainital High Court) के स्पष्ट आदेश के बावजूद कि “सार्वजनिक मार्ग पर कोई टोल नहीं वसूला जाएगा”, एक निजी कंपनी द्वारा बैरियर लगाकर अवैध वसूली किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यह मामला अब सीधे तौर पर Contempt of Court (न्यायालय की अवमानना) की श्रेणी में आता दिख रहा है।

क्या है हाई कोर्ट का आदेश?

एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि किसी भी सार्वजनिक सड़क पर टोल वसूलना वैधानिक नहीं है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट तक जाने वाली सार्वजनिक सड़क पर किसी भी प्रकार की रोक-टोक या वसूली बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, एस्टेट के भीतर विशिष्ट सुविधाओं के लिए ‘प्रवेश शुल्क’ अलग मुद्दा हो सकता है, लेकिन आम सड़क को रोकना कानूनन जुर्म है।

ग्राउंड रिपोर्ट: आदेश हवा में, वसूली जारी

स्थानीय लोगों और पर्यटकों का आरोप है कि निजी कंपनी ने सड़क के बीचों-बीच बैरियर लगा रखे हैं।

  • ट्रैफिक मैनेजमेंट का बहाना: कंपनी का तर्क है कि बैरियर केवल ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए है, लेकिन हकीकत में यहाँ एंट्री फीस के नाम पर वसूली हो रही है।
  • प्रशासन की चुप्पी: पर्यटन विभाग ने जिला प्रशासन और एसएसपी को आदेश के अनुपालन के निर्देश देने की बात कही है, लेकिन जमीनी स्तर पर वसूली का खेल अब भी जारी है।

न्यायालय की अवमानना और कार्रवाई की मांग

संविधान विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि कोर्ट के आदेश की कॉपी मिलने के बाद भी प्रशासन बैरियर नहीं हटाता और निजी कंपनी वसूली जारी रखती है, तो यह गंभीर न्यायिक अवमानना है। स्थानीय जनता की मांग है कि:

  1. एसएसपी और डीएम खुद मौके पर जाकर बैरियर हटवाएं।
  2. सार्वजनिक मार्ग और निजी एस्टेट की सीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित की जाए।
  3. हेल्पलाइन नंबर जारी हो जहाँ अवैध वसूली की तुरंत शिकायत की जा सके।

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