उत्तराखंड की SIR वोटर लिस्ट में अजीबोगरीब एंट्री! कहीं ‘शंकर कश्यप’ महिला, तो कहीं वोटर का नाम ‘पिथौरागढ़ पिथौरागढ़’ – Parvat Sankalp News

उत्तराखंड की SIR वोटर लिस्ट में अजीबोगरीब एंट्री! कहीं ‘शंकर कश्यप’ महिला, तो कहीं वोटर का नाम ‘पिथौरागढ़ पिथौरागढ़’

उत्तराखंड: चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची को शुद्ध और त्रुटिरहित बनाने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) की प्रक्रिया चलाई जा रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची में मौजूद गलतियों को दूर करना और पात्र मतदाताओं का विवरण दुरुस्त करना है। लेकिन उत्तराखंड की कुछ मतदाता सूचियों में कथित तौर पर सामने आई अजीबोगरीब प्रविष्टियों ने डेटा सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रुद्रपुर और पिथौरागढ़ विधानसभा क्षेत्रों की कुछ एंट्री को लेकर ऐसे दावे किए जा रहे हैं, जिनमें मतदाताओं के नाम, लिंग, पति के नाम और मकान संख्या जैसे विवरणों में गंभीर विसंगतियां दिखाई देती हैं। यदि ये प्रविष्टियां आधिकारिक मतदाता सूची में इसी रूप में दर्ज हैं, तो इनकी जांच और सुधार की जरूरत है।

रुद्रपुर की वोटर लिस्ट में ‘शंकर कश्यप’ का लिंग महिला दर्ज

पहला मामला विधानसभा क्षेत्र संख्या 66, रुद्रपुर के ट्रांजिट कैम्प वार्ड-2 से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध कराए गए विवरण के अनुसार, मतदाता सूची में क्रम संख्या 601 पर ‘शंकर कश्यप’ नाम दर्ज है। इस प्रविष्टि में उम्र 39 वर्ष और लिंग महिला बताया गया है। इतना ही नहीं, संबंधित मतदाता के पति के नाम वाले कॉलम में ‘यामीन खान’ दर्ज होने का दावा भी किया गया है। यदि सूची में यह विवरण सही रूप से दर्ज है, तो नाम, लिंग और पारिवारिक संबंध से जुड़े विवरणों के सत्यापन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, केवल नाम या पति के नाम के आधार पर किसी व्यक्ति की पहचान अथवा पारिवारिक स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। संबंधित प्रविष्टि की वास्तविकता आधिकारिक रिकॉर्ड से जांची जानी चाहिए।

पिथौरागढ़ में नाम से लेकर मकान संख्या तक एक ही विवरण!

दूसरी कथित गड़बड़ी विधानसभा क्षेत्र संख्या 44, पिथौरागढ़ की मतदाता सूची में सामने आई है। दिए गए विवरण के मुताबिक, क्रम संख्या 233 पर मतदाता का नाम ‘पिथौरागढ़ पिथौरागढ़’ दर्ज है। इस प्रविष्टि में पिता का नाम भी ‘पिथौरागढ़ पिथौरागढ़’ और मकान संख्या ‘पिथौरागढ़’ लिखी होने का दावा किया गया है। मतदाता की उम्र 21 वर्ष और लिंग महिला बताया गया है। यदि रिकॉर्ड में वास्तव में सभी कॉलम में इसी तरह का विवरण दर्ज है, तो यह डेटा एंट्री या सत्यापन से जुड़ी संभावित गड़बड़ी हो सकती है। ऐसे मामलों में यह जांचना जरूरी है कि गलती मूल आवेदन में थी, डेटा दर्ज करते समय हुई या अंतिम सूची तैयार होने के दौरान रह गई।

‘इंडियन इंडियन’ नाम से दर्ज मतदाता की एंट्री भी चर्चा में

एक अन्य कथित प्रविष्टि में मतदाता का नाम ‘इंडियन इंडियन’ दर्ज होने की बात कही गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस मतदाता की उम्र 30 वर्ष है और पति के नाम वाले कॉलम में भी यही नाम दर्ज बताया गया है। मकान संख्या में ‘इंडियन’ लिखा होने का दावा है। इसके अतिरिक्त, क्रम संख्या 559 पर दर्ज चंदा वर्मा के पति के नाम वाले कॉलम में भी ‘इंडियन इंडियन’ लिखे होने की बात सामने रखी गई है। इन प्रविष्टियों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें अंतिम रूप से प्रमाणित गड़बड़ी मानने के बजाय आधिकारिक सूची से मिलान कर जांचा जाना जरूरी है।

SIR के बाद वोटर लिस्ट की जांच पर उठे सवाल

विशेष गहन पुनरीक्षण का मकसद मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है। ऐसे में यदि किसी सूची में नाम, लिंग, रिश्ते या पते से संबंधित गलत विवरण मौजूद हैं, तो संबंधित अधिकारियों को उनकी जांच कर आवश्यक सुधार करना चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि ऐसी प्रविष्टियां कितनी हैं, वे किस स्तर पर दर्ज हुईं और अंतिम प्रकाशन से पहले उनका सत्यापन क्यों नहीं हो पाया। डिजिटल व्यवस्था और घर-घर सर्वे के बावजूद यदि गलतियां बनी रहती हैं, तो सत्यापन प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

चुनाव आयोग और प्रशासन से जांच की अपेक्षा

इन कथित प्रविष्टियों के सामने आने के बाद सबसे अहम सवाल यही है कि क्या संबंधित मतदाता विवरणों की दोबारा जांच की जाएगी? क्या गलत पाए जाने वाले रिकॉर्ड में नियमानुसार संशोधन होगा? और क्या ऐसी गलतियों को रोकने के लिए डेटा सत्यापन की व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा? मतदाता सूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए किसी भी गलत प्रविष्टि को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। साथ ही, किसी व्यक्ति की पहचान या मतदान की पात्रता पर सवाल उठाने से पहले आधिकारिक रिकॉर्ड और संबंधित निर्वाचन अधिकारियों की पुष्टि जरूरी है। फिलहाल, इन उदाहरणों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। यदि दावे सही साबित होते हैं, तो यह मतदाता सूची के सत्यापन और गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत को रेखांकित करेगा।

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