नई दिल्ली: देश में बदलती जनसांख्यिकी का अध्ययन करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से गठित हाईलेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज (HLCDC) की ओर से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेजे गए विस्तृत प्रश्नावली ने प्रशासनिक स्तर पर नई चुनौती खड़ी कर दी है। रिपोर्टों के मुताबिक समिति ने राज्यों से पिछले 15 वर्षों के दौरान धर्म के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ा डेटा मांगा है। कई राज्य सरकारों के अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके विभागों में मांगी गई कई सूचनाएं नियमित रूप से धर्म-वार दर्ज ही नहीं की जाती हैं।
मई 2026 में हुआ था हाईलेवल कमेटी का गठन
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर की अध्यक्षता में इस हाईलेवल कमेटी का गठन किया था। समिति में जनगणना आयुक्त के अलावा पूर्व IAS अधिकारी दुर्गा शंकर मिश्रा, पूर्व IPS अधिकारी बालाजी श्रीवास्तव और अर्थशास्त्री डॉ. शमिका रवि को सदस्य बनाया गया है। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (Foreigners-I) को समिति का सदस्य सचिव नियुक्त किया गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने समिति के गठन की जानकारी देते हुए कहा था कि इसका उद्देश्य अवैध आव्रजन और अन्य कारणों से होने वाले जनसांख्यिकीय बदलावों का व्यापक अध्ययन करना तथा धार्मिक और सामाजिक समुदायों में असामान्य आबादी परिवर्तन के पैटर्न का विश्लेषण करना है।
राज्यों को भेजी गई 35 सवालों की प्रश्नावली
जुलाई में सामने आई जानकारी के मुताबिक समिति ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से विस्तृत जानकारी हासिल करने के लिए प्रश्नावली तैयार की थी। इसके बाद राज्यों को अपने स्तर पर संबंधित विभागों से सूचनाएं जुटाने के लिए कहा गया। 28 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार, प्रश्नावली में पिछले 15 वर्षों के दौरान कई तरह के आंकड़े धर्म-वार उपलब्ध कराने से जुड़े सवाल शामिल हैं। इनमें जन्म पंजीकरण, वाहन पंजीकरण, स्कूलों में नामांकन और संपत्ति से जुड़े लेनदेन जैसी सूचनाएं शामिल हैं।
धार्मिक स्थलों और संस्थानों का भी मांगा गया ब्यौरा
रिपोर्टों के मुताबिक समिति ने राज्यों से पिछले 15 वर्षों में बने धार्मिक स्थलों का जिला-वार विवरण मांगा है। इसमें मंदिर, मस्जिद और चर्च जैसे धार्मिक स्थलों की जानकारी के साथ उनकी GIS मैपिंग से संबंधित सूचनाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा धार्मिक शिक्षण संस्थानों, जिनमें मदरसे भी शामिल हैं, से जुड़ी मैपिंग और अन्य विवरणों की जानकारी भी प्रश्नावली में मांगी गई है।
आधार, वोटर आईडी और राशन कार्ड में बदलाव पर भी नजर
समिति की ओर से राज्यों से आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड के पंजीकरण में असामान्य वृद्धि या बदलाव से संबंधित जानकारी भी मांगे जाने की रिपोर्ट है। इसके साथ ही ऐसे क्षेत्रों की पहचान से जुड़े सवाल भी पूछे गए हैं, जहां जनसंख्या के आंकड़ों में असामान्य बदलाव दिखाई देता है। सीमावर्ती क्षेत्रों और ऐसे इलाकों पर भी समिति का विशेष ध्यान बताया गया है, जहां आबादी में बड़े स्तर पर बदलाव सामने आया हो।
आदिवासी क्षेत्रों और धर्मांतरण से जुड़े सवाल
प्रश्नावली में अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों से जुड़े क्षेत्रों को लेकर भी जानकारी मांगी गई है। रिपोर्टों के अनुसार समिति ने आदिवासी समुदायों में धर्मांतरण से संबंधित इंटेलिजेंस रिपोर्ट, आयोगों की रिपोर्ट और राज्य सरकारों की ओर से की गई कार्रवाई का विवरण भी मांगा है। इसके अलावा अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन से जुड़ी व्यवस्था तथा फर्जी दस्तावेजों के मामलों की जानकारी भी प्रश्नावली का हिस्सा बताई गई है।
राज्यों के सामने सबसे बड़ी मुश्किल क्या है?
राज्य सरकारों के अधिकारियों के सामने मुख्य चुनौती उपलब्ध रिकॉर्ड की प्रकृति को लेकर है। रिपोर्टों में अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि सरकारी विभाग आम तौर पर वाहन पंजीकरण, संपत्ति लेनदेन या कई अन्य प्रशासनिक सेवाओं का डेटा धर्म के आधार पर नहीं रखते। यही वजह है कि समिति की ओर से मांगी गई कुछ सूचनाओं को मौजूदा सरकारी रिकॉर्ड से सीधे निकालना मुश्किल बताया जा रहा है। राज्यों को अलग-अलग विभागों से उपलब्ध जानकारी जुटाकर समिति को जवाब देना होगा। हालांकि, यह कहना कि संविधान के कारण सभी तरह का धर्म-वार सरकारी डेटा रखना पूरी तरह प्रतिबंधित है, अपने आप में एक व्यापक कानूनी निष्कर्ष होगा। अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में अलग-अलग प्रकार की व्यक्तिगत जानकारी दर्ज होने के नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए इस मुद्दे को प्रशासनिक डेटा-उपलब्धता और कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में अलग-अलग देखना होगा।
अवैध प्रवास और जनसंख्या बदलाव पर समिति का फोकस
समिति का गठन मुख्य रूप से अवैध आव्रजन, असामान्य जनसंख्या बदलाव और उससे जुड़े सामाजिक एवं सुरक्षा प्रभावों का अध्ययन करने के लिए किया गया है। गृह मंत्रालय ने समिति के काम को राष्ट्रीय संप्रभुता, सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, सामाजिक संरचना और जनजातीय समाज से जुड़े विषयों से जोड़ा है। जुलाई में समिति की गतिविधियों के बारे में सामने आई जानकारी के अनुसार, पैनल राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जमीनी स्तर की जानकारी हासिल करने तथा विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों से भी संबंधित विषयों पर फीडबैक लेने की तैयारी कर रहा था।
सच्चर कमेटी से तुलना का संदर्भ
इस मुद्दे को लेकर कुछ राजनीतिक और सामाजिक हलकों में 2005 में गठित सच्चर कमेटी की चर्चा भी हो रही है। हालांकि दोनों समितियों का गठन और उद्देश्य अलग हैं। सच्चर कमेटी का गठन तत्कालीन केंद्र सरकार ने मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए किया था, जबकि मौजूदा HLCDC को गृह मंत्रालय ने व्यापक जनसांख्यिकीय बदलाव, अवैध आव्रजन और असामान्य आबादी परिवर्तन का अध्ययन करने के लिए गठित किया है।इसलिए दोनों प्रक्रियाओं को सीधे समान मानने के बजाय उनके अलग-अलग कार्यादेश और समय-सीमा को ध्यान में रखना जरूरी है।
अब राज्यों के जवाब पर टिकी नजर
HLCDC की प्रश्नावली के बाद अब राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर जानकारी जुटाकर समिति के साथ साझा करनी होगी। जिन आंकड़ों का नियमित रूप से धर्म-वार रखरखाव नहीं हुआ है, उनके मामले में राज्य किस स्रोत और पद्धति के जरिए जवाब तैयार करते हैं, यह आगे महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। फिलहाल समिति का काम जारी है और अंतिम रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि उसके अध्ययन से जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर क्या निष्कर्ष और नीतिगत सुझाव सामने आते हैं।